श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 21: महाराज पृथु द्वारा उपदेश  »  श्लोक 22

 
श्लोक
अहं दण्डधरो राजा प्रजानामिह योजित: ।
रक्षिता वृत्तिद: स्वेषु सेतुषु स्थापिता पृथक् ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
अहम्—मैं; दण्ड-धर:—राजदण्ड धारण करने वाला; राजा—राजा; प्रजानाम्—प्रजा का; इह—इस संसार में; योजित:— तत्पर; रक्षिता—रक्षक; वृत्ति-द:—आजीविका देने वाला; स्वेषु—अपने आप में; सेतुषु—अपनी-अपनी सामाजिक व्यवस्थाओं (मर्यादा) में; स्थापिता—स्थापित; पृथक्—अलग-अलग ।.
 
अनुवाद
 
 राजा पृथु ने आगे कहा : भगवत्कृपा से मैं इस लोक का राजा नियुक्त हुआ हूँ और मैं प्रजा के ऊपर शासन करने, उसे विपत्ति से बचाने तथा वैदिक आदेश से स्थापित सामाजिक व्यवस्था में प्रत्येक की स्थिति के अनुसार उसे आजीविका प्रदान करने के लिए यह राजदण्ड धारण कर रहा हूँ।
 
तात्पर्य
 यह माना जाता है कि राजा की नियुक्ति भगवान् द्वारा अपने लोक विशेष के हित की रक्षा के लिए की जाती है। प्रत्येक लोक में एक अधिष्ठाता व्यक्ति होता है, जिस प्रकार आजकल प्रत्येक देश का एक राष्ट्रपति होता है। यदि कोई राष्ट्रपति या राजा बनता है, तो यह समझना चाहिए कि उसे यह सुअवसर ईश्वर-प्रदत्त है। वैदिक पद्धति के अनुसार राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि मानकर प्रजा द्वारा उसका मानव रूपी ईश्वर के ही समान आदर किया जाता है। वास्तव में वैदिक आदेशों के अनुसार परमेश्वर समस्त जीवात्माओं का और विशेष रूप से मनुष्यों का पालन करता है, जिससे वे उच्चतम पद प्राप्त करें। निम्न योनियों में अनेक जन्म लेते रहने के बाद जब जीवात्मा को मनुष्य योनि प्राप्त होती है विशेष रूप से सभ्य जीवन का तो समाज चार श्रेणियों में बँट जाता है जैसाकि भगवान् ने भगवद्गीता में कहा है (चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टम् )। ये चार वर्ण—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र समाज के प्राकृतिक वर्ण है और जैसाकि पृथु महाराज ने घोषणा की कि प्रत्येक वर्ण के प्रत्येक व्यक्ति को जीविकोपार्जन का उपयुक्त साधन प्राप्त होना चाहिए। राजा या सरकार का कर्तव्य है कि वह देखे कि लोग वर्णाश्रम धर्म का पालन करें तथा अपने-अपने व्यवसाय में लगे हों। आधुनिक समय में सरकारी या राजकीय संरक्षण प्राप्त न होने से सामाजिक व्यवस्था लगभग ढह गई है। किसी को भी ज्ञात नहीं है कि कौन ब्राह्मण है, कौन क्षत्रिय है, कौन वैश्य अथवा कौन शूद्र है। लोग अपने को जन्म से ही किसी वर्ण विशेष से सम्बद्ध बताते हैं। सरकार का कर्तव्य है कि वह वृत्तिपरक कार्यों तथा भौतिक प्रकृति के गुणों के अनुसार वर्णाश्रम-व्यवस्था स्थापित करे जिससे सम्पूर्ण संसार सुसंस्कृत हो सके। यदि सरकार चार सामाजिक वर्णों का पालन नहीं करती तो मानव समाज पशु समाज के तुल्य है, जिसमें न शान्ति और न सम्पन्नता रहती है, केवल अशान्ति व्याप्त रहती है। आदर्श राजा के रूप में महाराज पृथु ने वैदिक सामाजिक व्यवस्था का दृढ़तापूर्वक पालन किया।
प्रजायते इति प्रजा। प्रजा शब्द का अर्थ है, जो जन्म लेता है, अत: पृथु राजा ने अपने राज्य में जन्मे सभी लोगों—प्रजानाम्—को सुरक्षा प्रदान की। प्रजा का अर्थ न केवल मनुष्य है, वरन् इसमें पशु, वृक्ष तथा अन्य सजीव प्राणी भी आते हैं। यह राजा का कर्तव्य है कि वह सभी को संरक्षण तथा भोजन प्रदान करे। आधुनिक समाज के मूर्ख तथा धूर्तजन सरकार के उत्तरदायित्व-क्षेत्र को नहीं जानते। पशु भी उस भूमि की प्रजा हैं जिसमें उनका जन्म होता है और उन्हें भी भगवान् के सहारे जीने का अधिकार प्राप्त है। पशुओं की बड़े पैमाने पर हत्या से पशुओं की जनसंख्या में गड़बड़ी होने के कारण कसाई, देश तथा सरकार का भविष्य संकट में पड़ जाएगा।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥