श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 21: महाराज पृथु द्वारा उपदेश  »  श्लोक 24

 
श्लोक
य उद्धरेत्करं राजा प्रजा धर्मेष्वशिक्षयन् ।
प्रजानां शमलं भुङ्क्ते भगं च स्वं जहाति स: ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो कोई (राजा या शासक); उद्धरेत्—वसूल करते हैं; करम्—कर, टैक्स; राजा—राजा; प्रजा:—नागरिक; धर्मेषु— अपने-अपने कर्तव्यों में; अशिक्षयन्—उन्हें उनके कर्तव्यों की शिक्षा दिये बिना; प्रजानाम्—नागरिकों का; शमलम्—अपवित्र; भुङ्क्ते—भोगता है; भगम्—धन; च—भी; स्वम्—अपना; जहाति—त्यागता है; स:—वह राजा ।.
 
अनुवाद
 
 कोई राजा जो अपनी प्रजा को वर्ण तथा आश्रम के अनुसार अपने-अपने कर्तव्यों को करने की शिक्षा न देकर उनसे केवल कर और उपकर वसूल करता है, उसे प्रजा द्वारा किये गये अपवित्र कार्यों के लिए दण्ड भोगना होता है। ऐसी अवनति के साथ ही राजा की अपनी सम्पदा भी जाती रहती है।
 
तात्पर्य
 राजा, शासक या राष्ट्रपति को चाहिए कि अपना कर्तव्य निबाहे बिना केवल अपने पद पर बना न रहे। उसे अपने राज्य के अन्तर्गत लोगों को सिखाना चाहिए कि वर्ण तथा आश्रम धर्म का कैसे निर्वाह किया जाये। यदि राजा ऐसे आदेश देने में ढिलाई बरतता है और मात्र कर लगाने में ही सन्तुष्ट रहता है, तो जो इस संग्रहण कार्य में शरीक होते हैं यथा सभी सरकारी कर्मचारी तथा राज्य का प्रमुख, उन्हें जनता के अपवित्र कार्यों (पापकर्मों) का भागी होना पड़ता है। प्रकृति के नियम अत्यन्त सूक्ष्म हैं। उदाहरणार्थ, यदि कोई किसी पापमय स्थान पर भोजन करता है, तो वह वहाँ पर घटित पाप के कर्मफल
का भागी होता है (इसीलिए वैदिक प्रथा है कि गृहस्थ ब्राह्मणों तथा वैष्णवों को उत्सव सम्पन्न करते समय अपने घर भोजन करने के लिए आमंत्रित करता है, क्योंकि ब्राह्मण और वैष्णव उसे पापकर्म से मुक्त करा सकते हैं, किन्तु कट्टर ब्राह्मणों तथा वैष्णवों को चाहिए कि वे सभी जगहों के आमंत्रण स्वीकार न करें। हाँ, जिन भोजों में प्रसाद वितरित होता हो वहाँ जाने में कोई प्रतिबन्ध नहीं है)। ऐसे अनेक सूक्ष्म नियम हैं जिनका लोगों को ज्ञान नहीं होता, किन्तु कृष्णभावनामृत आन्दोलन विश्व-भर के लोगों के लाभार्थ इस वैदिक ज्ञान का वैज्ञानिक विधि से प्रचार कर रहा है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥