श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 21: महाराज पृथु द्वारा उपदेश  »  श्लोक 33

 
श्लोक
तमेव यूयं भजतात्मवृत्तिभि-
र्मनोवच:कायगुणै: स्वकर्मभि: ।
अमायिन: कामदुघाङ्‌घ्रिपङ्कजं
यथाधिकारावसितार्थसिद्धय: ॥ ३३ ॥
 
शब्दार्थ
तम्—उसको; एव—निश्चय ही; यूयम्—तुम समस्त नागरिक; भजत—पूजा करो; आत्म—अपना; वृत्तिभि:—वृत्तिपरक कार्य द्वारा; मन:—मन; वच:—वाणी; काय—शरीर; गुणै:—विशिष्ट गुणों द्वारा; स्व-कर्मभि:—अपने-अपने कर्मों से; अमायिन:— बिना हिचक; काम-दुघ—समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाले; अङ्घ्रि-पङ्कजम्—चरणकमल की; यथा—जिस प्रकार; अधिकार—सामर्थ्य; अवसित-अर्थ—अपने हित के विषय में पूरी तरह आश्वस्त; सिद्धय:—तुष्टि ।.
 
अनुवाद
 
 पृथु महाराज ने अपने प्रजाजनों को उपदेश दिया : तुम सबों को अपने मन, वचन, देह तथा कर्मों के फल सहित सदैव खुले मन से भगवान् की भक्ति करनी चाहिए। तुम सब अपनी सामर्थ्य तथा वृत्तिपरक कार्यों के अनुसार पूरे विश्वास तथा बिना हिचक के भगवान् के चरणकमलों की सेवा में संलग्न रहो। तब निश्चय ही तुम्हें अपने-अपने जीवन-उद्देश्य प्राप्त करने में सफलता प्राप्त होगी।
 
तात्पर्य
 जैसाकि भगवद्गीता के अठारहवें अध्याय में कहा गया है—स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य— मनुष्य को अपने वृत्तिपरक कार्यों द्वारा भगवान् की पूजा करनी होती है। इसमें चारों वर्णों तथा चारों आश्रमों के सिद्धान्त को स्वीकार करना पड़ता है। अत: पृथु महाराज कहते हैं—गुणै: स्वकर्मभि:। इस पदांश की व्याख्या भगवद्गीता में इस प्रकार प्राप्त है—चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश:— “भगवान् द्वारा प्राकृतिक गुणों तथा उन गुणों के अन्तर्गत विशिष्ट कर्तव्यों के अनुसार चारों जातियाँ (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र) बनाई गईं।” जो व्यक्ति सतोगुणी होता है, वह निश्चित रूप से अन्यों की अपेक्षा अधिक बुद्धिमान होता है। अत: वह ब्राह्मण के कार्य—सत्य बोलना, इन्द्रियों का संयम, मन का संयम, स्वच्छता, सहिष्णुता, आत्मज्ञान तथा भक्ति का ज्ञान—कर सकता है। इस प्रकार यदि वह सच्चे ब्राह्मण की भाँति भगवान् की सेवा करता है, तो उसके जीवन का अन्तिम लक्ष्य पूरा हो जाता है। इसी प्रकार क्षत्रियों के कर्तव्य हैं नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करना, दान देना, राजकाज में वैदिक व्यवस्था का पालन तथा यदि शत्रु आक्रमण कर दे तो निर्भीक होकर लडऩा। इस प्रकार एक क्षत्रिय अपने वृत्तिपरक कार्यों से भगवान् को प्रसन्न कर सकता है। इसी तरह वैश्य अपने वृत्तिपरक कर्मों को करता हुआ—अन्न उपजा कर, गौवों की सुरक्षा करके तथा अधिक कृषि उत्पादन होने पर आवश्यक व्यापार द्वारा—भगवान् को प्रसन्न कर सकता है। चूँकि शूद्रों के अधिक बुद्धि नहीं होती, अत: उन्हें सामाजिक जीवन के उच्चतर स्तरों की सेवा करने में श्रमिक की भाँति लगे रहना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति का लक्ष्य भगवान् को अपने मन, वचन, कर्म से प्रसन्न करना होना चाहिए। जिस प्रकार शरीर के चार विभाग हैं—सिर, हाथ, पेट तथा पाँव—उसी प्रकार मानव समाज भी मनुष्यों के भौतिक गुणों तथा वृत्तिपरक कर्मों के अनुसार चार श्रेणियों में बँटा हुआ है। इस तरह ब्राह्मणों को सिर का, क्षत्रियों को भुजाओं का, वैश्यों को पेट का तथा शूद्रों को पैरों का कार्य करना पड़ता है। जीवन के निर्दिष्ट कर्मों को करते समय न कोई छोटा है, न कोई बड़ा। हाँ, इनमें उच्चतर तथा निम्नतर जैसे विभाग होते हैं, किन्तु भगवान् को प्रसन्न करने का एकमात्र लक्ष्य होने से उनमें कोई अन्तर नहीं होता।
यहाँ यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि जब ब्रह्मा, शिव तथा अन्य बड़े-बड़े देवता भगवान् की पूजा करते हैं, ऐसा माना जाता है तो फिर इस लोक का सामान्य व्यक्ति उनकी सेवा किस प्रकार कर सकता है? इसकी स्पष्ट व्याख्या पृथु महाराज ने यथाधिकार शब्द के प्रयोग द्वारा की है, जिसका अर्थ है “अपने-अपने सामर्थ्य के अनुसार।” यदि कोई निष्ठापूर्वक अपना कर्तव्य पूरा करे तो वही पर्याप्त होगा। उसे न तो ब्रह्मा बनने की आवश्यकता है न शिव, इन्द्र, चैतन्य या रामानुजाचार्य, जिनकी सामर्थ्य हम सबों से निश्चय ही बहुत अधिक है। यहाँ तक कि भौतिक गुणों के अनुसार जीवन के सबसे नीचे स्तर पर स्थित शूद्र भी वही सफलता प्राप्त कर सकता है। कोई भी व्यक्ति भक्ति में सफलता प्राप्त कर सकता है, यदि उसमें द्विधा न रहे। यहाँ यह बताया गया है कि मनुष्य को स्पष्ट वक्ता तथा खुले दिमाग वाला (अमायिन: ) होना चाहिए। भक्ति में सफलता प्राप्त करने के लिए जीवन के निम्न स्तर पर स्थित होना कोई अयोग्यता नहीं है। इसके लिए एकमात्र योग्यता है कि वह निष्कपट हो तथा उसमें हिचक न हो, फिर चाहे वह ब्राह्मण हो या क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र। तब वह गुरु के निर्देशन में अपना वृत्तिपरक कर्म करता हुआ जीवन की उच्चतम सफलता प्राप्त कर सकता है। भगवद्गीता (९.३२) में भगवान् ने स्वयं पुष्टि की है—स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्। चाहे कोई ब्राह्मण हो या कि क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र अथवा निचले दर्जे की स्त्री, इससे कोई अन्तर नहीं आता। यदि कोई शरीर, मन तथा बुद्धि से गम्भीरतापूर्वक भक्ति में प्रवृत्त होता है, तो वह अवश्य ही भगवान् के धाम वापस जाता है। भगवान् के चरणकमलों को कामदुघाङ्घ्रि पंकजम् कहा गया है, क्योंकि वे प्रत्येक व्यक्ति की इच्छाओं को पूरा करने में समर्थ हैं। एक भक्त अपने इसी जीवन में सुखी रहता है, क्योंकि इस संसार में हमारी तो अनेक आवश्यकताएँ हैं, किन्तु भक्त की सारी आवश्यकताएँ पूरी हुई रहती हैं और अन्त में जब वह शरीर त्यागता है, तो वह बिना किसी संदेह के भगवान् के धाम को वापस जाता है।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥