श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 21: महाराज पृथु द्वारा उपदेश  »  श्लोक 38

 
श्लोक
ब्रह्मण्यदेव: पुरुष: पुरातनो
नित्यं हरिर्यच्चरणाभिवन्दनात् ।
अवाप लक्ष्मीमनपायिनीं यशो
जगत्पवित्रं च महत्तमाग्रणी: ॥ ३८ ॥
 
शब्दार्थ
ब्रह्मण्य-देव:—ब्राह्मण संस्कृति का स्वामी; पुरुष:—परम पुरुष; पुरातन:—सबसे प्राचीन; नित्यम्—शाश्वत; हरि:—भगवान्; यत्—जिसका; चरण—चरणकमल; अभिवन्दनात्—पूजा के द्वारा; अवाप—प्राप्त किया; लक्ष्मीम्—ऐश्वर्य; अनपायिनीम्— निरन्तर; यश:—ख्याति; जगत्—विश्व का; पवित्रम्—पवित्र करने वाली; च—भी; महत्—महान्; तम—सर्वाधिक परम; अग्रणी:—सर्वोपरि प्रथम ।.
 
अनुवाद
 
 पुरातन, शाश्वत तथा समस्त महापुरुषों में अग्रणी भगवान् ने अपनी स्थिर ख्याति के ऐश्वर्य को ब्राह्मणों तथा वैष्णवों के चरणकमलों की उपासना के द्वारा प्राप्त किया जो समग्र ब्रह्माण्ड को पवित्र करने वाला है।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर परम पुरुष को ब्रह्मण्यदेव कहा गया है। ब्रह्मण्य ब्राह्मण, वैष्णव अथवा ब्राह्मण संस्कृति का द्योतक है और देव का अर्थ है “पूज्य भगवान्!” अत: जब तक कोई वैष्णव के दिव्य पद पर या सतोगुण पद पर (ब्राह्मण के रूप में) नहीं होता, तब तक वह भगवान् को नहीं समझ सकता। रजो तथा तमो गुणों की निम्न अवस्थाओं में तो भगवान् को समझ पाना और भी कठिन होता है। अत: यहाँ पर भगवान् को ब्राह्मण तथा वैष्णव संस्कृति वाले व्यक्तियों द्वारा पूज्य अर्चा-विग्रह बताया गया है।
नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च।

जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नम: ॥

(विष्णु पुराण १.१९.६५) भगवान् कृष्ण ब्राह्मण संस्कृति तथा गोवंश के आदि रक्षक हैं। इनको जाने तथा इनका सम्मान किये बिना ब्रह्मज्ञान समझ में नहीं आता और इस ज्ञान के बिना कोई भी कल्याणकारी कार्य या मानवतावादी प्रचार-कार्य सफल नहीं हो सकता। भगवान् पुरुष या परम भोक्ता होता है। वह भगवान् न केवल अवतार लेने पर भोगता है, वरन् शाश्वत (नित्यम् ) अनादि काल (पुरातन ) से वह ऐसा करता आ रहा है। यच्चरणाभिवन्दनात्—पृथु महाराज ने कहा कि भगवान् को यह शाश्वत ख्याति रूपी ऐश्वर्य ब्राह्मणों के चरणकमलों की निरन्तर पूजा से मिला है। भगवद्गीता में कहा गया है कि भगवान् को भौतिक लाभ प्राप्त करने के लिए कुछ भी नहीं करना पड़ता। चूँकि वे निरन्तर परिपूर्ण रहते हैं, अत: उन्हें किसी चीज की आवश्यकता नहीं होती। तो यह भी कहा जाता है कि उन्होंने यह ऐश्वर्य ब्राह्मणों के चरणकमलों की सेवा करके प्राप्त किया है। ये उनके आदर्श कार्य हैं। जब श्रीकृष्ण द्वारका में थे तो उन्होंने नारद के चरणकमलों पर अपना मस्तक रख कर उनका सम्मान किया था। जब विप्र सुदामा उनके घर आये, तो उन्होंने सुदामा के चरण धोये और अपनी शय्या में बैठाया। भगवान् होते हुए भी उन्होंने महाराज युधिष्ठिर तथा कुन्ती का आदर किया। भगवान् के ये आदर्श आचरण हम सबों को शिक्षा देने के लिए हैं। हमें उनके व्यक्तिगत आचरण से सीखना चाहिए कि किस प्रकार गौवों की रक्षा की जाये, किस प्रकार ब्राह्मणों के गुण विकसित किये जाँय और ब्राह्मणों तथा भक्तों का किस प्रकार आदर किया जाये। श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता (३.२१)में कहा है—यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:—महापुरुष जिस-जिस तरह आचरण करता है उसका अनुकरण लोग स्वत: ही करते हैं। भला भगवान् से बढक़र महापुरुष अन्य कौन हो सकता है और किसका आचरण उनसे अधिक आदर्शमय हो सकता है? ऐसा नहीं है कि उन्हें भौतिक लाभ प्राप्त करने के लिए इन कर्मों को करने की आवश्यकता थी, अपितु संसार को आचरण सिखाने के लिए ये सारे कार्य सम्पन्न किये गये।

यहाँ पर भगवान् को महत्-तम-अग्रणी: कहा गया है। इस संसार में महत्तम अर्थात् महापुरुष तो ब्रह्माजी तथा शिव हैं, किन्तु वे इनसे भी ऊपर हैं। नारायण: परोऽव्यक्तात्—भगवान् इस संसार में उत्पन्न की गई समस्त वस्तुओं से ऊपर दिव्य स्थिति में हैं। उनका ऐश्वर्य, धन, सौन्दर्य, ज्ञान, त्याग तथा ख्याति सभी जगत्-पवित्रम् अर्थात् सारे संसार को पवित्र करने वाले हैं। हम जितनी ही उनके ऐश्वर्य के विषय में बातें करते हैं, यह संसार उतना ही अधिक पवित्र होता जाता है। इस संसार में भौतिक व्यक्ति का ऐश्वर्य स्थिर नहीं है। जो आज धनी है, वह कल दरिद्र हो सकता है, जो आज विख्यात है, वही कल अप्रसिद्ध बन सकता है। भौतिक ऐश्वर्य कभी स्थिर नहीं रहता, किन्तु भगवान् के छहों ऐश्वर्य न केवल आध्यात्मिक जगत में वरन् इस भौतिक जगत में भी शाश्वत हैं। भगवान् कृष्ण का यश स्थिर है और उनके ज्ञानग्रन्थ भगवद्गीता का आज भी आदर होता है। भगवान् से सम्बन्धित सारी वस्तुएँ शाश्वत हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥