श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 21: महाराज पृथु द्वारा उपदेश  »  श्लोक 47

 
श्लोक
हिरण्यकशिपुश्चापि भगवन्निन्दया तम: ।
विविक्षुरत्यगात्सूनो: प्रह्लादस्यानुभावत: ॥ ४७ ॥
 
शब्दार्थ
हिरण्यकशिपु:—प्रह्लाद महाराज का पिता; च—भी; अपि—पुन:; भगवत्—भगवान् की; निन्दया—निन्दा से; तम:—नारकीय जीवन के गहनतम क्षेत्र में; विविक्षु:—प्रविष्ट किया; अत्यगात्—उबार लिया गया; सूनो:—अपने पुत्र; प्रह्लादस्य—महाराज प्रह्लाद के; अनुभावत:—प्रभाव से ।.
 
अनुवाद
 
 इसी प्रकार हिरण्यकशिपु अपने पापकर्मों से भगवान् की सत्ता (श्रेष्ठता) का उल्लंघन करता हुए नारकीय जीवन के गहनतम क्षेत्र में प्रविष्ट हुआ, किन्तु अपने महान् पुत्र प्रह्लाद महाराज की कृपा से उसका भी उद्धार हो सका और वह भगवान् के धाम वापस चला गया।
 
तात्पर्य
 जब प्रह्लाद महाराज को उनकी भक्ति तथा सहिष्णुता के कारण नृसिंह देव ने वर दिया तो उन्होंने भगवान् के एक भी वर को यह सोचकर स्वीकार नहीं किया कि, ऐसा करना एक निष्ठावान भक्त को शोभा नहीं देता। अच्छा पुरस्कार पाने के लालच से भगवान् की सेवा किये जाने को प्रह्लाद महाराज ने एक व्यापारिक सौदा मानते हुए तिरस्कृत किया है। चूँकि प्रह्लाद महाराज वैष्णव थे, अत: उन्होंने अपने लिए कोई वरदान न माँग कर अपने पिता के प्रति वत्सलता प्रकट की। यद्यपि उनके पिता ने उन्हें यातनाएँ दी थी और यदि भगवान् ने उसका वध न कर दिया होता तो उसके द्वारा वे स्वयं मारे गये होते, किन्तु तो भी प्रह्लाद महाराज ने उसके लिए भगवान् से क्षमा माँगी। भगवान् ने उनकी अभिलाषा स्वीकार करके हिरण्यकशिपु को नारकीय जीवन के गहनतम अंधकार से उबारा, जिससे वह अपने पुत्र की कृपा से भगवान् के धाम वापस जा सका। प्रह्लाद महाराज ऐसे वैष्णव के सर्वोत्तम उदाहरण हैं, जो इस संसार में नारकीय जीवन बिताने वाले पापी पुरुषों के प्रति अत्यन्त दयालु होते हैं। इसीलिए कृष्ण पर-दु:ख-दु:खी कृपाम्बुघि: नाम से जाने जाते हैं। भगवान् के सभी शुद्ध भक्त प्रह्लाद महाराज के ही समान इस संसार में पापी लोगों के उबारने के लिए दया से परिपूर्ण हो कर आते हैं। वे सभी प्रकार के कष्टों को सहिष्णु बन कर सहते हैं, क्योंकि वैष्णव का यह एक अन्य गुण है, जो संसार की नारकीय दशाओं से पापी पुरुषों के उद्धार के लिए प्रयत्नशील रहता है। अत: वैष्णवों की निम्न विधि से स्तुति की जाती है—
वाञ्छाकल्पतरुभ्यश्च कृपासिन्धुभ्य एव च।

पतितानां पावनेभ्यो वैष्णवेभ्यो नमो नम: ॥

वैष्णव का मुख्य कार्य पतित आत्माओं का उद्धार करना है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥