श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 21: महाराज पृथु द्वारा उपदेश  »  श्लोक 48

 
श्लोक
वीरवर्य पित: पृथ्व्या: समा: सञ्जीव शाश्वती: ।
यस्येद‍ृश्यच्युते भक्ति: सर्वलोकैकभर्तरि ॥ ४८ ॥
 
शब्दार्थ
वीर-वर्य—वीरों में सर्वश्रेष्ठ; पित:—पिता; पृथ्व्या:—पृथ्वी का; समा:—वर्ष में बराबर; सञ्जीव—जीवित रहते; शाश्वती:— सदा के लिए; यस्य—जिसका; ईदृशी—इस तरह; अच्युते—परमेश्वर को; भक्ति:—भक्ति में बराबर; सर्व—सभी; लोक— लोक, ग्रह; एक—एक; भर्तरि—पालक ।.
 
अनुवाद
 
 सभी साधु ब्राह्मणों ने पृथु महाराज को इस प्रकार सम्बोधित किया—हे वीरश्रेष्ठ, हे पृथ्वी के पिता, आप दीर्घजीवी हों, क्योंकि आपमें समस्त ब्रह्माण्ड के स्वामी अच्युत भगवान् के प्रति अत्यधिक श्रद्धा है।
 
तात्पर्य
 सभा में उपस्थित साधु पुरुषों ने पृथु महाराज को दीर्घ आयु प्राप्त करने का आशीर्वाद दिया, क्योंकि भगवान् के प्रति उनकी श्रद्धा तथा भक्ति अटूट थी। यद्यपि जीवन की अवधि सीमित वर्षों की होती है, किन्तु यदि सौभाग्यवश कोई भक्त हो जाता है, तो वह प्रदत्त जीवन-अवधि को पार कर लेता है। निस्सन्देह कभी-कभी योगी अपने इच्छानुसार मरते हैं, प्राकृतिक नियमों के अनुसार नहीं। भक्त की दूसरी विशेषता यह है कि वह भगवद्भक्ति के कारण सदा-सदा के लिए जीवित रहता है। कहा गया है कि कीर्तिर्यस्य
स जीवति—“जो अपने पीछे अच्छी ख्याति छोड़ता है, वह सदैव जीवित रहता है।” विशेष रूप से भगवान् का भक्त तो निश्चित रूप से सदैव जीवित रहता है। जब भगवान् चैतन्य महाप्रभु रामानन्द राय से वार्तालाप कर रहे थे तो चैतन्य महाप्रभु ने पूछा, “सबसे बड़ा यश क्या है?” रामानन्द राय का उत्तर था—जो महान् भक्त के रूप में ख्यातिप्राप्त है उसी की सर्वाधिक ख्याति है, क्योंकि भक्त न केवल वैकुण्ठलोक में ही सदैव वास करता है, किन्तु वह इस संसार में भी अपनी ख्याति से सदा जीवित रहता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥