श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 21: महाराज पृथु द्वारा उपदेश  »  श्लोक 50

 
श्लोक
नात्यद्भुतमिदं नाथ तवाजीव्यानुशासनम् ।
प्रजानुरागो महतां प्रकृति: करुणात्मनाम् ॥ ५० ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; अति—अत्यधिक; अद्भुतम्—आश्चर्यजनक; इदम्—यह; नाथ—हे स्वामी; तव—तुम्हारा; आजीव्य—आय का स्रोत; अनुशासनम्—प्रजा के ऊपर शासन; प्रजा—नागरिक; अनुराग:—प्रेम; महताम्—बड़े का; प्रकृति:—प्रकृति; करुण— दयावान; आत्मनाम्—जीवात्माओं का ।.
 
अनुवाद
 
 हे नाथ! अपनी प्रजा पर शासन करना तो आपका वृत्तिपरक धर्म है। यह आप-जैसे महापुरुष के लिए कोई आश्चर्यजनक कार्य नहीं है, क्योंकि आप अत्यन्त दयालु हैं और अपनी प्रजा के हितों के प्रति अत्यन्त प्रेम रखते हैं। यही आपके चरित्र की महानता है।
 
तात्पर्य
 राजा का कर्तव्य है कि वह अपनी प्रजा की रक्षा करे और अपनी जीविका के लिए उस पर कर लगाए। चूँकि वैदिक समाज चार वर्णों—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र—में विभाजित है, अत: शास्त्रों में उनकी जीविका के साधनों का भी उल्लेख हुआ है। ब्राह्मणों को चाहिए कि वे ज्ञान का प्रसार करें, अत: वे अपने शिष्यों से दान ले—किन्तु राजा को चाहिए कि वह प्रजा को जीवन के उच्चतम स्तर तक उठने के लिए सुरक्षा प्रदान करे, अत: वह इसके लिए प्रजा पर कर लगा सकता है। चूँकि वणिक वर्ग सारे समाज के लिए अन्न उत्पन्न करता है, अत: वह इससे थोड़ा लाभ ले सकता है, जबकि शूद्र ब्राह्मणों, क्षत्रियों या वैश्यों की भाँति कार्य नहीं कर सकते, अत: उन्हें समाज के उच्चतर वर्गों की सेवा करनी चाहिए और उनसे अपने जीवन की समस्त आवश्यकताएँ पूरी करवानी चाहिए।
यहाँ पर योग्य राजा या राज नेता के लक्षणों को इस प्रकार बताया गया है—उसे लोगों पर अत्यन्त दयालु होना चाहिए और उनके मुख्य हित का ध्यान रखना चाहिए जो कि उन्हें भगवान् का उच्चस्थ भक्त बनना है। महापुरुष स्वभाव से अन्यों का हित करने वाले होते हैं और एक वैष्णव तो समाज का सबसे दयालु व्यक्ति होता है। अत: हम वैष्णव नायक को इस प्रकार प्रणाम करते हैं—

वाञ्छाकल्पतरुभ्यश्च कृपासिन्धुभ्य एव च।

पतितानां पावनेभ्यो वैष्णवेभ्यो नमो नम: ॥

एकमात्र वैष्णव नेता ही लोगों की समस्त अभिलाषाओं को पूरा कर सकता हैं (वाञ्छाकल्पतरु:) और वह अत्यन्त दयावान होता है, क्योंकि वह मानव-समाज का महान् कल्याणकर्ता है। वह पतितपावन है, क्योंकि यदि राजा या शासनाध्यक्ष ब्राह्मणों तथा वैष्णवों के पदचिह्नों पर चलते हैं, जो स्वभावत: प्रचार-कार्य में अग्रणी होते हैं, तो वैश्य भी वैष्णवों तथा ब्राह्मणों का अनुसरण करेंगे और शूद्र इनकी सेवा करेंगे। इस प्रकार सारा समाज जीवन की परम सिद्धि हेतु एक परिपूर्ण संस्था बन जाता है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥