श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 21: महाराज पृथु द्वारा उपदेश  »  श्लोक 6

 
श्लोक
पूजित: पूजयामास तत्र तत्र महायशा: ।
पौराञ्जानपदांस्तांस्तान्प्रीत: प्रियवरप्रद: ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
पूजित:—पूजा जाकर; पूजयाम् आस—पूजा की; तत्र तत्र—जहाँ-तहाँ, सर्वत्र; महा-यशा:—महान् कार्य करने वाले; पौरान्— नगर के भद्र जन; जान-पदान्—सामान्य नागरिक; तान् तान्—उसी प्रकार से; प्रीत:—प्रसन्न किया; प्रिय-वर-प्रद:—समस्त वर देने के लिए प्रस्तुत ।.
 
अनुवाद
 
 नगर के भद्र तथा सामान्य जनों ने राजा का हार्दिक स्वागत किया और राजा ने भी उन्हें मनवांछित आशीर्वाद दिया।
 
तात्पर्य
 सम्मान्य राजा के पास उसकी प्रजा की पहुँच होती थी। सामान्य रूप से बड़े तथा छोटे सभी तरह के लोग राजा को देखने की इच्छा रखते थे और उससे आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते थे। राजा को इसका पता रहता था, अत: जब भी वह प्रजा से मिलता था उनकी इच्छाओं की अविलम्ब पूर्ति करता था या उनकी शिकायतों को दूर करता था। इस प्रकार के व्यवहार में राजतंत्र तथाकथित
प्रजातंत्र सरकार से अच्छा होता है, क्योंकि प्रजातंत्र में प्रजा कार्यकारी अध्यक्ष से नहीं मिल पाती और प्रजा की शिकायतों को दूर करने के लिए कोई उत्तरदायी नहीं होता। उत्तरदायी राजतंत्र में सरकार के विरुद्ध प्रजा की कोई शिकायत नहीं रहती थी और यदि कोई रहती भी थी तो राजा के पास पहुँच कर तुरन्त उसका निराकरण किया जा सकता था।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥