श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 22: चारों कुमारों से पृथु महाराज की भेंट  »  श्लोक 18

 
श्लोक
सनत्कुमार उवाच
साधु पृष्टं महाराज सर्वभूतहितात्मना ।
भवता विदुषा चापि साधूनां मतिरीद‍ृशी ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
सनत्-कुमार: उवाच—सनत्कुमार ने कहा; साधु—साधु प्रकृति का; पृष्टम्—प्रश्न; महाराज—हे राजा; सर्व-भूत—सभी जीवात्माएँ; हित-आत्मना—सबों का हित चाहने वाले के द्वारा; भवता—आपके द्वारा; विदुषा—अत्यन्त विद्वान; च—तथा; अपि—यद्यपि; साधूनाम्—साधु पुरुषों की; मति:—बुद्धि; ईदृशी—ऐसी ।.
 
अनुवाद
 
 सनत्कुमार ने कहा : हे राजा पृथु, आपने मुझसे बहुत ही अच्छा प्रश्न पूछा है। ऐसे प्रश्न, विशेष रूप से आप-जैसे पर-हितकारी द्वारा उठाये जाने के कारण समस्त जीवात्माओं के लिए अत्यन्त लाभप्रद हैं। यद्यपि आप सब कुछ जानते हैं, किन्तु आप ऐसे प्रश्नों को इसीलिए पूछ रहे हैं, क्योंकि यह साधु पुरुषों का आचरण है। ऐसी बुद्धि आपके सर्वथा अनुरूप है।
 
तात्पर्य
 महाराज पृथु दिव्य विज्ञान में पारंगत थे; फिर भी उन्होंने अपने को कुमारों के समक्ष अज्ञानी के रूप में प्रस्तुत किया। इसका उद्देश्य यह है कि भले ही कोई व्यक्ति कितना सम्मान्य क्यों न हो, उसे अपने से श्रेष्ठ व्यक्ति के समक्ष ऐसे ही प्रश्न प्रस्तुत करने चाहिए। उदाहरणार्थ, अर्जुन को समस्त दिव्य विज्ञान प्राप्त था, किन्तु वे श्रीकृष्ण से इस प्रकार पूछ रहे थे मानो उन्हें कुछ ज्ञात ही नहीं था। इसी प्रकार
पृथु महाराज सब कुछ जानते थे, किन्तु उन्होंने कुमारों के समक्ष अपने आपको इस प्रकार प्रस्तुत किया मानो वे कुछ भी नहीं जानते थे। तात्पर्य यह है कि महापुरुषों द्वारा भगवान् या उनके भक्तों के समक्ष जो प्रश्न प्रस्तुत किये जाते हैं, वे सामान्य लोगों के लाभ के लिए होते हैं। अत: कभी-कभी महापुरुष जान-बूझकर उच्चतर अधिकारी से प्रश्न करते हैं, क्योंकि वे सदैव दूसरों के कल्याण का चिन्तन करते रहते हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥