श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 22: चारों कुमारों से पृथु महाराज की भेंट  »  श्लोक 23

 
श्लोक
अर्थेन्द्रियारामसगोष्ठ्यतृष्णया
तत्सम्मतानामपरिग्रहेण च ।
विविक्तरुच्या परितोष आत्मनि
विना हरेर्गुणपीयूषपानात् ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
अर्थ—धन; इन्द्रिय—इन्द्रियाँ; आराम—तृप्ति; स-गोष्ठी—अपने संगी सहित; अतृष्णया—वितृष्णा से; तत्—उस; सम्मतानाम्—उनके द्वारा अनुमोदित; अपरिग्रहेण—अस्वीकृति द्वारा; च—भी; विविक्त-रुच्या—अरुचि; परितोषे—प्रसन्नता; आत्मनि—स्व; विना—रहित; हरे:—भगवान् के; गुण—गुण; पीयूष—अमृत; पानात्—पीने से ।.
 
अनुवाद
 
 ऐसे लोगों की संगति न करके, जो केवल इन्द्रियतृप्ति एवं धनोपार्जन के फेर में रहते हैं, मनुष्य को आध्यात्मिक जीवन में उन्नति करनी चाहिए। उसे न केवल ऐसे लोगों से दूर रहना चाहिए, वरन् जो उनका संग करते हैं उनसे भी बचना चाहिए। मनुष्य को अपना जीवन इस प्रकार ढालना चाहिए कि जिसमें उसे भगवान् हरि की महिमा का अमृत पान किये बिना चैन न मिले। इस प्रकार इन्द्रियभोग से विरक्ति उत्पन्न होने पर मनुष्य उन्नति कर सकता है।
 
तात्पर्य
 इस भौतिक जगत में हर एक व्यक्ति धन तथा इन्द्रियतृप्ति में रुचि रखता है। उसका एकमात्र उद्देश्य अधिक से अधिक धन अर्जित करके उसे इन्द्रियों की तुष्टि में व्यय करना होता है। श्रील शुकदेव गोस्वामी ने भागवत (२.१.३) में भौतिकतावादी पुरुषों के लक्षण इस प्रकार बताए हैं— निद्रया ह्रियते नक्तं व्यवायेन च वा वय:।
दिवा चार्थेहया राजन् कुटुम्बभरणेन वा ॥

भौतिकतावादी पुरुषों का यह अनूठा उदाहरण है। रात्रि में वे छह घंटों से अधिक सो कर या काम-क्रीड़ा में व्यस्त रहकर समय गँवाते हैं। यह तो उनका रात का व्यापार है। प्रात:काल वे कार्यालय या दुकान में धन कमाने जाते हैं। ज्योंही उनके हाथ में कुछ धन आ जाता है वे अपने बच्चों तथा अन्यों के लिए वस्तुएँ खरीदने में लग जाते हैं। ऐसे लोग जीवन के महत्त्व को कि ईश्वर क्या है, जीवात्मा क्या है और ईश्वर से उसका क्या सम्बन्ध है आदि बातें समझने की कभी परवाह नहीं करते। हालत यहाँ तक बिगड़ चुकी है कि जो लोग धार्मिक कहलाते हैं, वे भी इस समय केवल इन्द्रियतृप्ति में लगे हुए हैं। इस कलियुग में अन्य युगों की अपेक्षा भौतिकतावादी पुरुषों की संख्या बढक़र किसी भी अन्य युग से अधिक हो चुकी है, अत: जो लोग भगवान् के धाम को वापस जाना चाहते हैं उन्हें न केवल सिद्ध पुरुषों की सेवा करनी चाहिए, अपितु उन्हें ऐसे भौतिकतावादी पुरुषों का साथ छोड़ देना चाहिए जिनका एकमात्र उद्देश्य धन कमाना और धन को इन्द्रियतृप्ति में व्यय करना है। उन्हें इन लोगों के उद्देश्य को अर्थात् धन तथा इन्द्रियतृप्ति को अपना जीवन लक्ष्य नहीं बनाना चाहिए। इसीलिए कहा गया है—भक्ति: परेशानुभवो विरक्तिरन्यत्र च (भागवत ११.२.४२)। भक्ति में आगे बढऩे के लिए आवश्यक है कि मनुष्य भौतिकतावादी जीवन-प्रणाली में रुचि न रखे। जिन विषयों में भक्तों की रुचि होती है उनमें अभक्त कोई रुचि नहीं रखते।

मात्र भौतिकतावादी पुरुषों का निषेध या संगति का बहिष्कार करने से ही काम नहीं चलेगा। हमारे पास काम होना चाहिए। कभी-कभी यह देखा गया है आध्यात्मिक उन्नति की इच्छा वाले लोग भौतिक समाज का परित्याग कर निर्जन स्थान में चले जाते हैं, जैसाकि योगियों के लिए बताया गया है, किन्तु इससे मनुष्य की आध्यात्मिक उन्नति नहीं हो सकती, क्योंकि अनेक बार ऐसे योगी भी भ्रष्ट होते देखे जाते हैं। जहाँ तक ज्ञानियों का प्रश्न है वे भगवान् के चरणकमलों की शरण न ग्रहण करने के कारण नीचे गिरते हैं। निर्विशेषवादी या शून्यवादी भौतिक संगति से दूर ही रह सकते हैं, बिना भक्ति में निरत हुए वे अध्यात्म में स्थित नहीं रह सकते। भक्ति का प्रारम्भ भगवान् की महिमा के श्रवण से होता है। इस श्लोक में इसी की संस्तुति है—विना हरेर्गुणपीयूषपानात्। मनुष्य को चाहिए कि भगवान् की महिमा का अमृत पिये और इसका अर्थ होता है कि सदैव भगवान् की महिमा का श्रवण तथा कीर्तन करे। आध्यात्मिक जीवन में अग्रसर होने की मुख्य विधि यही है। भगवान् चैतन्य महाप्रभु ने चैतन्य- चरितामृत में इसी की संस्तुति की है। यदि कोई आध्यात्मिक जीवन में प्रगति करना चाहता है, तो भाग्यशाली होने पर गुरु से उसकी भेंट हो सकती है और उसी से वह श्रीकृष्ण के विषय में सीख सकता है। गुरु तथा श्रीकृष्ण दोनों की सेवा से उसे भक्ति का बीज (भक्ति-लता-बीज ) प्राप्त होता है और यदि वह इस बीज को अपने हृदय में बोकर श्रवण तथा कीर्तन के जल से सींचता है, तो यह विशाल भक्ति लता का रूप धारण कर लेती है। यह लता इतनी प्रबल होती है कि ब्रह्माण्ड के आवरण को भेद कर आत्म-लोक में पहुँच जाती है और तब तक बढ़ती रहती है जब तक श्रीकृष्ण के चरणारविन्द का आश्रय नहीं पा लेती, जिस प्रकार कि सामान्य लता छत पर दृढ़ आश्रय लेने तक धीरे धीरे बढ़ती रहती है और फिर उसमें वांछित फल लगने लगते हैं। ऐसे फल के बढऩे का मूल कारण होता है भक्ति-लता को श्रवण तथा कीर्तन रूपी जल से सींचते जाना। इस फल को यहाँ पर भगवान् की महिमा के श्रवण करने का अमृत कहा गया है। तात्पर्य यह है कि मनुष्य भक्तों के समाज से बाहर नहीं रह सकता; उसे भक्तों की संगति में रहना चाहिए जहाँ भगवान् की महिमा का निरन्तर श्रवण तथा कीर्तन होता है। कृष्णभावनामृत-आन्दोलन इसी उद्देश्य से प्रारम्भ किया गया है, जिससे सैकड़ों इस्कान केन्द्रों में लोगों को श्रवण तथा कीर्तन का सुअवसर प्राप्त हो सके, वे गुरु को पा सकें और भौतिक पुरुषों की संगति से विलग हो सकें। इस प्रकार से लोग भगवान् के धाम वापस जाने की सुदृढ़ आधार-भूमि तैयार कर सकते हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥