श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 22: चारों कुमारों से पृथु महाराज की भेंट  »  श्लोक 25

 
श्लोक
हरेर्मुहुस्तत्परकर्णपूर
गुणाभिधानेन विजृम्भमाणया ।
भक्त्या ह्यसङ्ग: सदसत्यनात्मनि
स्यान्निर्गुणे ब्रह्मणि चाञ्जसा रति: ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
हरे:—भगवान् के; मुहु:—निरन्तर; तत्-पर—भगवान् के सन्दर्भ में; कर्ण-पूर—कान का आभूषण; गुण-अभिधानेन—दिव्य गुणों की विवेचना से; विजृम्भमाणया—कृष्ण-चेतना (भक्ति) को बढ़ाने से; भक्त्या—भक्ति से; हि—निश्चय ही; असङ्ग:— अदूषित; सत्-असति—भौतिक जगत; अनात्मनि—आत्मनि (आध्यात्मिक ज्ञान) का उल्टा; स्यात्—होना चाहिए; निर्गुणे— अध्यात्म में; ब्रह्मणि—परमेश्वर में; च—तथा; अञ्जसा—सरलतापूर्वक; रति:—आकर्षण ।.
 
अनुवाद
 
 भक्त को चाहिए कि भगवान् के दिव्य गुणों के निरन्तर श्रवण द्वारा भक्ति-अनुशीलन में उत्तरोत्तर वृद्धि करे। ये लीलाएँ भक्तों के कानों के आभूषण सदृश हैं। भक्ति करने तथा भौतिक गुणों को पार करने से मनुष्य सहज ही अध्यात्म में भगवान् में स्थिर हो सकता है।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक का विशेष उल्लेख श्रवण द्वारा भक्ति की पुष्टि हेतु किया गया है। भक्त पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की लीलाओं या इनसे सम्बद्ध विषयों के अतिरिक्त और कुछ नहीं सुनना चाहता। हम सिद्धपुरुषों से भगवद्गीता तथा श्रीमद्भागवत सुनकर अपनी भक्ति की प्रखरता को बढ़ा सकते हैं। हम सिद्ध पुरुषों से जितना ही अधिक सुनेंगे भक्ति में उतना ही अग्रसर होंगे और जितना ही हम भक्ति के क्षेत्र में आगे बढ़ेंगे उतना ही भौतिक जगत से विरक्त होते जायेंगे। जैसाकि भगवान् चैतन्य महाप्रभु ने उपदेश दिया है कि हम जितना ही भौतिक जगत से विरक्त होंगे उतनी ही भगवान् के प्रति आसक्ति में वृद्धि होगी। अत: जो भक्त भक्ति में सतत प्रगति करना तथा भगवान् के धाम को जाना चाहता है उसे सारे इन्द्रियसुख तथा ऐसे व्यक्तियों की संगति त्याग देनी चाहिए जो धन तथा इन्दियतृप्ति के पीछे दीवाने रहते हैं। यही भगवान् चैतन्य महाप्रभु का उपदेश है (चैतन्य-चरितामृत, मध्य, ११.८)—
निष्किञ्चनस्य भगवद्भजनोन्मुखस्य पारं परं जिगमिषोर्भवसागरस्य।

सर्न्दशनं विषयिणाम् अथ योषितां च हा हन्त हन्त विष-भक्षणतोऽप्यसाधु ॥

इस श्लोक में आये हुए ब्रह्मणि शब्द की टीका निर्विशेषवादियों अथवा भागवत के कथावाचकों ने की है, जो जन्मना जाति-प्रथा के समर्थक हैं। उनके अनुसार ब्रह्मणि का अर्थ निर्गुण (निराकार) ब्रह्म है। किन्तु भक्त्या तथा गुणाभिधानेन शब्दों के प्रसंग में ऐसा अर्थ नहीं निकाला जा सकता। निर्विशेषवादियों के अनुसार निर्गुण ब्रह्म दिव्य गुणों से सम्पन्न नहीं होता, अत: हमें ब्रह्मणि का अर्थ “भगवान् में” ग्रहण करना चाहिए। जैसाकि अर्जुन ने भगवद्गीता में स्वीकार किया है श्रीकृष्ण ही भगवान् हैं, अत: जहाँ कहीं भी ब्रह्म शब्द आया है, वह श्रीकृष्ण के लिए प्रयुक्त है, निर्गुण ब्रह्म तेज के लिए नहीं। ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते (भागवत १.२.११)। ब्रह्म, परमात्मा तथा भगवान् इन सबको ब्रह्म माना जा सकता है, किन्तु जहाँ भक्ति शब्द का प्रसंग आए या दिव्य गुणों के स्मरण का उल्लेख है, तो यह भगवान् का द्योतक होगा, निर्गुण ब्रह्म का नहीं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥