श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 22: चारों कुमारों से पृथु महाराज की भेंट  »  श्लोक 26

 
श्लोक
यदा रतिर्ब्रह्मणि नैष्ठिकी पुमा-
नाचार्यवान् ज्ञानविरागरंहसा ।
दहत्यवीर्यं हृदयं जीवकोशं
पञ्चात्मकं योनिमिवोत्थितोऽग्नि: ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
यदा—जब; रति:—आसक्ति; ब्रह्मणि—भगवान् में; नैष्ठिकी—स्थिर; पुमान्—मनुष्य; आचार्यवान्—गुरु के प्रति पूर्णत: समर्पित; ज्ञान—ज्ञान; विराग—विरक्ति; रंहसा—के बल से; दहति—जलाता है; अवीर्यम्—नपुंसक; हृदयम्—हृदय के भीतर; जीव-कोशम्—आत्मा का आवरण; पञ्च-आत्मकम्—पाँचों तत्त्व; योनिम्—जन्म का स्रोत; इव—सदृश; उत्थित:—उद्भूत; अग्नि:—आग ।.
 
अनुवाद
 
 गुरु की कृपा से तथा ज्ञान एवं विराग के जागरित होने से भगवान् के प्रति आसक्ति में स्थिर हो जाने पर जीवात्मा जो शरीर के अन्तस्तल में स्थित तथा पाँच तत्त्वों से आच्छादित है अपने भौतिक परिवेश को उसी प्रकार जला देता है, जिस प्रकार काष्ठ से उत्पन्न अग्नि काष्ठ को ही भस्मसात् कर देती है।
 
तात्पर्य
 कहा जाता है कि हृदय के भीतर जीवात्मा तथा परमात्मा साथ-साथ निवास करते हैं। वेदों का कथन है—हृदि ह्ययमात्मा—आत्मा तथा परमात्मा दोनों हृदय के भीतर वास करते हैं। जीवात्मा का उद्धार तब होता है, जब वह भौतिक हृदय से बाहर निकल आता है अथवा हृदय को स्वच्छ करके आध्यात्मिक बना देता है। यहाँ पर दिया गया दृष्टान्त अत्यन्त उपयुक्त है—योनिम् इवोत्थितोऽग्नि:। अग्नि काष्ठ से उत्पन्न हो जाती है, तो यह काष्ठ को ही पूर्ण रूप से जला देती है। इसी प्रकार जब कोई जीवात्मा भगवान् के प्रति आसक्ति बढ़ा देता है, तो समझना चाहिए कि वह अग्नि के तुल्य है। प्रज्ज्वलित अग्नि ताप तथा प्रकाश से दृष्टिगोचर होती है। इसी प्रकार जब हृदय के भीतर जीवात्मा पूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान से प्रकाशित एवं संसार से विरक्त हो जाता है, तो वह अपने पंचतत्त्वों के आवरण को जला देता है और पाँच प्रकार की आसक्तियों यथा अविद्या, अहंकार, आसक्ति, ईर्ष्या तथा भौतिक चेतना में तल्लीनता से मुक्त हो जाता है। अत: इस श्लोक में पञ्चात्मकम् या तो पाँच तत्त्वों के लिए या कि भौतिक कल्मष के पाँच आवरणों के लिए आया है। जब ये सब ज्ञान तथा विराग की अग्नि से भस्म हो जाते हैं, तो मनुष्य भगवान् की भक्ति में स्थिर होता है। जब तक मनुष्य प्रामाणिक गुरु की शरण में नहीं जाता और उसके उपदेश के अनुसार श्रीकृष्ण के प्रति अनुरक्ति नहीं बढ़ाता तब तक जीवात्मा के हृदय से पाँचों आवरण हटाये नहीं जा सकते। जीवात्मा हृदय में केन्द्रित है और उसको हृदय से निकालने का अर्थ है उसका उद्धार, इसकी यह विधि है। मनुष्य को प्रामाणिक गुरु की शरण लेनी चाहिए और उनके आदेशों से अपना आध्यात्मिक ज्ञान बढ़ाना चाहिए, इस भौतिक संसार से विरक्त होना चाहिए और इस प्रकार मुक्त हो जाना चाहिए। अत: सिद्ध भक्त भौतिक शरीर के भीतर नहीं रहता; वह तो अपने आध्यात्मिक शरीर के भीतर वैसे ही रहता है जैसे कि जटा के भीतर रहते हुए भी नारियल (गरी) जटा से भिन्न रहता है। अत: शुद्ध भक्त का शरीर चिन्मय शरीर (आध्यात्मिक शरीर) कहलाता है। दूसरे शब्दों में, भक्त का शरीर भौतिक कार्यकलापों से सम्बन्धित नहीं रहता; फलस्वरूप भक्त सदैव मुक्त रहता है (ब्रह्मभूयाय कल्पते) जैसाकि भगवद्गीता (१४.२६) में पुष्टि की गई है। इसकी पुष्टि श्रील रूप गोस्वामी ने इस प्रकार की है—
ईहा यस्य हरेर्दास्ये कर्मणा मनसा गिरा।

निखिलास्वप्यवस्थासु जीवन्मुक्त: स उच्यते ॥

“जो मन, वचन तथा कर्म से भगवान् की सेवा में पूर्णत: लगा रहता है, वह चाहे जिस भी स्थिति में रहे, अपने शरीर के भीतर होते हुए भी मुक्त रहता है।”

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥