श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 22: चारों कुमारों से पृथु महाराज की भेंट  »  श्लोक 28

 
श्लोक
आत्मानमिन्द्रियार्थं च परं यदुभयोरपि ।
सत्याशय उपाधौ वै पुमान् पश्यति नान्यदा ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
आत्मानम्—आत्मा; इन्द्रिय-अर्थम्—इन्द्रियतृप्ति हेतु; च—तथा; परम्—दिव्य; यत्—जो; उभयो:—दोनों; अपि—निश्चय ही; सति—स्थित होकर; आशये—भौतिक इच्छाएँ; उपाधौ—उपाधि या नाम; वै—निश्चय ही; पुमान्—मनुष्य; पश्यति—देखता है; न अन्यदा—अन्यथा नहीं ।.
 
अनुवाद
 
 जब आत्मा इन्द्रियतृप्ति के हेतु रहता है, तो वह नाना प्रकार की इच्छाएँ उत्पन्न करता है, जिसके कारण उसको उपाधियाँ दी जाती हैं। किन्तु जब मनुष्य दिव्य स्थिति में रहता है, तो वह भगवान् की इच्छाओं को पूरा करने के अतिरिक्त और किसी कार्य में रुचि नहीं दिखाता।
 
तात्पर्य
 भौतिक इच्छाओं से आच्छादित होने के कारण आत्मा को विशेष प्रकार की देह- उपाधियों से ढका हुआ माना जाता है। इस प्रकार आत्मा अपने को पशु, मनुष्य, देवता, पक्षी, इत्यादि मानता है। अहंकार से जनित झूठी पहचान से कई प्रकार से प्रभावित होकर और मोहमयी भौतिक इच्छाओं से आच्छादित होकर वह पदार्थ तथा आत्मा में भेद करने लगता है। जब मनुष्य इस प्रकार के भेदभाव से रहित होता है, तो पदार्थ तथा आत्मा में कोई अन्तर नहीं रह जाता। तब तो आत्मा ही प्रमुख कारण बन जाता है। जब तक मनुष्य भौतिक इच्छाओं से ढका हुआ रहता है, वह अपने को भोक्ता या स्वामी मानता है। इस प्रकार वह इन्द्रियतृप्ति के लिए कार्य करता है और भौतिक पीड़ा, सुख तथा दुख से प्रभावित होता है। किन्तु जब मनुष्य जीवन के इस बोध से मुक्त हो जाता है, तो फिर वह उपाधियों से प्रभावित नहीं होता और वह प्रत्येक वस्तु को परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य में आध्यात्मिक मानता है। श्रील रूप गोस्वामी ने भक्तिरसामृत सिन्धु (१.२.२५५) में इसकी व्याख्या की है—
अनासक्तस्य विषयान्यथार्हमुपयुञ्जत:।

निर्बन्ध: कृष्ण सम्बन्धे युक्तं वैराग्यमुच्यते ॥

मुक्त पुरुष को न तो इन्द्रियतृप्ति से, न ही अन्य किसी भौतिक पदार्थ से लगाव होता है। वह समझ जाता है कि प्रत्येक वस्तु भगवान् से सम्बन्धित है और प्रत्येक वस्तु का उपयोग भगवान् की सेवा में किया जाना चाहिए। फलत: वह किसी भी वस्तु का त्याग नहीं करता। उसके लिए किसी भी वस्तु को त्यागने का प्रश्न नहीं उठता, क्योंकि परमहंस जानता है कि किस प्रकार प्रत्येक वस्तु को भगवान् की सेवा में लगाया जाए। मूलत: प्रत्येक वस्तु आध्यात्मिक है, कुछ भी भौतिक नहीं है। श्रीचैतन्य-चरितामृत (मध्य ८.२७४) में भी कहा गया है कि महाभागवत में कोई भौतिक दृष्टि नहीं होती—

स्थावर-जंगम देखे, ना देखे तार मूर्ति।

सर्वत्र हय निज इष्ट-देव-स्फूर्ति ॥

यद्यपि वह वृक्षों, पर्वतों तथा अन्य जीवों को यहाँ-वहाँ देखता है, किन्तु वह उन्हें परमेश्वर की सृष्टि रूप में देखता है, वह केवल स्रष्टा को देखता है, सृजित को नहीं। दूसरे शब्दों में, सृजित तथा स्रष्टा में कोई अन्तर नहीं दिखता। वह प्रत्येक वस्तु में भगवान् के दर्शन करता है। वह प्रत्येक वस्तु में श्रीकृष्ण को और श्रीकृष्ण में प्रत्येक वस्तु को पाता है। यही एकाकार है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥