श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 22: चारों कुमारों से पृथु महाराज की भेंट  »  श्लोक 30

 
श्लोक
इन्द्रियैर्विषयाकृष्टैराक्षिप्तं ध्यायतां मन: ।
चेतनां हरते बुद्धे: स्तम्बस्तोयमिव ह्रदात् ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
इन्द्रियै:—इन्द्रियों के द्वारा; विषय—विषय वस्तु; आकृष्टै:—आकृष्ट होकर; आक्षिप्तम्—विचलित; ध्यायताम्—सदैव सोचते हुए; मन:—मन; चेतनाम्—चेतना; हरते—खो जाती है; बुद्धे:—बुद्धि की; स्तम्ब:—बड़े-बड़े तिनके, कुशादि; तोयम्—जल; इव—सदृश; ह्रदात्—झील (जलाशय) से ।.
 
अनुवाद
 
 जब मनुष्य का मन तथा इन्द्रियाँ सुख-भोग के हेतु विषय-वस्तुओं के प्रति आकर्षित होते हैं, तो मन विचलित हो जाता है। परिणाम स्वरूप लगातार विषय-वस्तुओं का चिन्तन करने से मनुष्य की असली कृष्णचेतना वैसे ही खो जाती है, जैसे कि जलाशय के किनारे उगे हुए बड़ी बड़ी कुश जैसी घास के द्वारा चूसे जाने के कारण जलाशय का जल।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में बड़े ही सुन्दर ढंग से बताया गया है कि हमारी मूल कृष्णचेतना किस प्रकार दूषित हो जाती है और हम किस प्रकार परमेश्वर से अपने सम्बन्ध को उत्तरोत्तर भूलते जाते हैं। पिछले श्लोक में बताया गया है कि हमें निरन्तर भगवान् की भक्ति में लगे रहना चाहिए जिससे भक्ति की प्रज्ज्वलित अग्नि समस्त भौतिक इच्छाओं को भस्म कर दे और हम जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो सकें। यह वह अप्रत्यक्ष विधि भी है, जिससे हम परमेश्वर के चरणारविन्द में अपनी अटूट श्रद्धा बनाये रख सकते हैं। जब मन को निरन्तर इन्द्रियतृप्ति के बारे में सोचने के लिए छोड़ दिया जाता है, तो वह हमारे भौतिक बन्धन का कारण बन जाता है। यदि हमारा मन इन्द्रियतृप्ति के विषयों से ही पूरित रहे तो हम कृष्णभक्ति करने की चाह रखकर भी सतत अभ्यास के कारण इन्द्रियतृप्ति के विषय को नहीं भूल सकते। यदि कोई संन्यास आश्रम ग्रहण कर ले, किन्तु मन को वश में न कर पाए तो वह सदैव इन्द्रियतृप्ति—यथा परिवार, समाज, कीमती घर इत्यादि—के बारे में सोचता रहेगा। भले ही वह हिमालय में या जंगल में क्यों न चला जाय उसका मन इन्द्रियतृप्ति की वस्तुओं में रमा रहेगा। इस प्रकार क्रमश: मनुष्य की बुद्धि प्रभावित होती रहेगी जिससे कृष्णचेतना (भक्ति) के प्रति उसकी मौलिक रुचि समाप्त हो जाएगी।
यहाँ पर दिया गया उदाहरण अत्यन्त सटीक है। यदि किसी विशाल जलाशय के चारों ओर ऊंची-

ऊंची कुश घास उगी हो तो उसका जल सूख जाएगा। इसी प्रकार जब भौतिक इच्छाएं बढ़ जाती हैं, तो चेतना का स्वच्छ जल सूख जाता है। अत: कुश को पहले से ही काट देना या समूल नष्ट कर देना चाहिए। श्री चैतन्य महाप्रभु का उपदेश है कि यदि धान के खेत में खर-पतवारों को उगने दिया जाए तो वे उर्वरक तथा जल का उपयोग कर लेंगे और धान के पौधे सूख जाएँगे। इन्द्रियभोग की इच्छा ही इस जगत में हमारे पतन का कारण है और हम तीन प्रकार के तापों एवं जन्म, मृत्यु, जरा तथा रोग के शिकार होते रहते हैं। किन्तु यदि हम अपनी इच्छाओं को भगवान् की दिव्य प्रेमा-भक्ति की ओर मोड़ दें तो हमारी इच्छाएँ पवित्र हो जाती हैं। हम इच्छाओं को मार नहीं सकते। हमें उन्हें विभिन्न उपाधियों से शुद्ध करना है। यदि हम अपने को निरन्तर किसी विशेष राष्ट्र, समाज या परिवार के सदस्य के रूप में मान कर उन्हीं का चिन्तन करते रहें तो हम जन्म-मरण के बद्धजीवन में दृढ़तापूर्वक उलझ जाते हैं। किन्तु यदि हमारी इच्छाएँ भगवान् की सेवा में लग जाँए तो वे पवित्र हो जाती हैं और हम भौतिक कल्मष से तुरन्त मुक्त हो जाते हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥