श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 22: चारों कुमारों से पृथु महाराज की भेंट  »  श्लोक 33

 
श्लोक
अर्थेन्द्रियार्थाभिध्यानं सर्वार्थापह्नवो नृणाम् ।
भ्रंशितो ज्ञानविज्ञानाद्येनाविशति मुख्यताम् ॥ ३३ ॥
 
शब्दार्थ
अर्थ—धन; इन्द्रिय-अर्थ—इन्द्रियों की तुष्टि के लिए; अभिध्यानम्—निरन्तर ध्यान करने से; सर्व-अर्थ—चार प्रकार की उपलब्धियाँ, पुरुषार्थ; अपह्नव:—विनाशकारी; नृणाम्—मानव समाज की; भ्रंशित:—से रहित; ज्ञान—ज्ञान; विज्ञानात्—भक्ति से; येन—इससे; आविशति—प्रवेश करता है; मुख्यताम्—जड़ जीवन ।.
 
अनुवाद
 
 धन कमाने तथा इन्द्रितृप्ति के लिए उसके उपयोग के विषय में निरन्तर सोचते रहने से मानव-समाज के प्रत्येक व्यक्ति का पुरुषार्थ विनष्ट होता है। जब कोई ज्ञान तथा भक्ति से शून्य हो जाता है, वह वृक्षों तथा पत्थरों की सी जड़ योनियों में प्रवेश करता है।
 
तात्पर्य
 ज्ञान का अर्थ है अपनी स्वाभाविक स्थिति को समझना और विज्ञान का अर्थ है जीवन में उस ज्ञान को व्यवहार में लाना। मनुष्य जीवन प्राप्त करके व्यक्ति को ज्ञान तथा विज्ञान की स्थिति प्राप्त कर लेनी चाहिए, किन्तु इस सुअवसर के होते हुए भी यदि कोई गुरु तथा शास्त्रों की सहायता से ज्ञान तथा विज्ञान प्राप्त नहीं कर पाता अर्थात् वह इस सुअवसर का उपयोग नहीं करता है, तो अगले जन्म में उसे जड़ योनि प्राप्त होना निश्चित है। जड़ योनि के अन्तर्गत पर्वत, वृक्ष, पौधे इत्यादि आते हैं। जीवन की यह अवस्था पुण्यताम् या मुख्यताम् कहलाती है, जिसका अर्थ है सभी कार्यकलाप शून्य हो जाना। ऐसे दार्शनिक, जो समस्त कार्यकलापों को समाप्त करने के पक्षपाती हैं, शून्यवादी कहलाते हैं। सहज रूप में हमारे सारे कार्यकलाप उत्तरोत्तर भक्ति की ओर उन्मुख होने चाहिए। किन्तु कुछ ऐसे भी दार्शनिक हैं, जो
कर्मों को शुद्ध न करके प्रत्येक वस्तु को शून्य या समस्त कार्यकलापों से रहित कर देना चाहते हैं। क्रियाशीलता का ऐसा अभाव वृक्षों तथा पर्वतों में पाया जाता है। यह प्रकृति द्वारा प्रदत्त दण्ड जैसा है। यदि हम आत्म-साक्षात्कार के जीवन-लक्ष्य को उचित ढंग से प्राप्त नहीं कर सकते तो प्रकृति हमें वृक्ष तथा पर्वत के रूप में जड़ बनाकर दंड देगी। इसलिए इन्द्रियतृप्ति के हेतु किये गये कर्मों की यहाँ भर्त्सना की गई है। जो निरन्तर धन-अर्जन तथा इन्द्रियतृप्ति के विषय में ही सोचता रहता है, वह ऐसे पथ पर अग्रसर होता है जो आत्मघाती है। वस्तुत: समूचा मानव-समाज इसी पथ का अनुसरण कर रहा है कि भीख माँगके, चोरी करके अथवा उधार लेने से, चाहे जिस प्रकार से धन आए, लोग धन कमाने तथा उसका उपभोग इन्द्रियतृप्ति करने जुटे हुए हैं। ऐसी सभ्यता आत्म- साक्षात्कार के पथ में सबसे बड़ी बाधक है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥