श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 22: चारों कुमारों से पृथु महाराज की भेंट  »  श्लोक 36

 
श्लोक
परेऽवरे च ये भावा गुणव्यतिकरादनु ।
न तेषां विद्यते क्षेममीशविध्वंसिताशिषाम् ॥ ३६ ॥
 
शब्दार्थ
परे—जीवन की उच्चतर स्थिति में; अवरे—जीवन की निम्नतर अवस्था में; च—तथा; ये—ये सब; भावा:—विचार; गुण— भौतिक गुण; व्यतिकरात्—अन्योन्य क्रिया से; अनु—पीछे-पीछे चलना; न—कभी नहीं; तेषाम्—उनका; विद्यते—विद्यमान है; क्षेमम्—कुशल; ईश—परमेश्वर; विध्वंसित—विनष्ट; आशिषाम्—आशीर्वादों का ।.
 
अनुवाद
 
 हम उच्चतर जीवन की विभिन्न अवस्थाओं को जीवन की निम्नतर अवस्थाओं से अलग करते हुए वरदानस्वरूप ग्रहण करते हैं, किन्तु हमें स्मरण रखना चाहिए कि इस प्रकार के भेदभाव भौतिक प्रकृति के गुणों की अन्योन्य क्रिया के प्रसंग में ही विद्यमान रहते हैं। वस्तुत: जीवन की इन अवस्थाओं का कोई स्थायी अस्तित्व नहीं होता, क्योंकि ये परम नियन्ता द्वारा विनष्ट कर दी जाएंगी।
 
तात्पर्य
 हम इस संसार में जीवन के उच्चतर रूप को आशीर्वाद (वरदान) के रूप में ग्रहण करते हैं और निम्नतर रूप को अभिशाप। उच्चतर अथवा निम्नतर का यह अन्तर तभी तक रहता है जब तक विभिन्न भौतिक गुण परस्पर क्रिया करते हैं। दूसरे शब्दों में, हम अपने अच्छे कर्मों से उच्चतर लोकों को या उच्चतर जीवन स्तर (यथा उत्तम शिक्षा, सुन्दर शरीर, इत्यादि) को प्राप्त होते हैं। ये सब पुण्य कर्मों के प्रतिफल हैं। इसी तरह अपवित्र कार्यों से हम अशिक्षित रह जाते हैं, कुरूप शरीर पाते हैं, गरीब बने रहते हैं, इत्यादि। किन्तु जीवन की ये विभिन्न अवस्थाएँ सतो, रजो तथा तमो गुणों की पारस्परिक क्रिया द्वारा प्रकृति के नियमों के अधीन हैं। ये सारे गुण इस समग्र विश्व के विलय के समय कार्य करना बन्द कर देते हैं। अत: भगवान् ने भगवद्गीता (८.१६) में कहा है—
आब्रह्मभुवनाल्लोका: पुनरावर्तिनोऽर्जुन।

मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥

भले ही हम अपने आपको विज्ञान की उन्नति के बल पर या जीवन के धार्मिक नियमों—त्याग तथा कर्म—से उच्चतर लोक तक उठा लें, किन्तु प्रलय के समय ये सारे लोक तथा उनके प्राणी विनष्ट हो जाँएगे। इस श्लोक में ईशविध्वंसिताशिषाम् सूचित करता है कि ये सारे आशीर्वाद परम नियन्ता द्वारा ध्वस्त कर दिये जाएँगे। उस समय कोई हमारी रक्षा नहीं करेगा। चाहे इस लोक में हों, या अन्य लोक में, हमारे शरीर विनष्ट हो जाएँगे और हमें महाविष्णु के शरीर के भीतर लाखों वर्षों तक अचेत अवस्था में रहना होगा और जब सृष्टि पुन: प्रकट होगी तो उसमें हमें विभिन्न योनियों में जन्म लेकर अपने कार्य प्रारम्भ करने होंगे। अत: मात्र उच्चतर लोक तक उठ जाने से ही हमें सन्तुष्ट नहीं हो जाना चाहिए। हमें इस दृश्य जगत से बाहर निकलने, आत्मजगत में जाने और भगवान् की शरण ग्रहण करने का प्रयास करना चाहिए। यही हमारी सर्वोच्च उपलब्धि है। हमें किसी भी उच्च या निम्न भौतिक वस्तु के प्रति आकृष्ट न होकर उन्हें समान स्तर पर देखना चाहिए। हमारा वास्तविक कार्य जीवन-उद्देश्य की खोज और भगवान् की भक्ति करना होना चाहिए। इस प्रकार हम ज्ञान तथा आनन्द से परिपूर्ण अपने आध्यात्मिक कार्यों में सतत आशीर्वाद पाते रहेंगे।

नियमित मानवीय सभ्यता से धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष की प्रगति होती है। मानव समाज में धर्म होना ही चाहिए। बिना धर्म के मानव समाज पशुओं का समाज है। आर्थिक विकास तथा इन्द्रियतृप्ति को धर्म पर आधारित होना चाहिए। जब धर्म, अर्थ तथा काम समंजित हो जाते हैं, तो जन्म, मृत्यु, जरा तथा रोग से मुक्ति निश्चित है। किन्तु इस कलिकाल में धर्म तथा मुक्ति का प्रश्न ही नहीं उठता। लोगों की रुचि केवल आर्थिक विकास तथा इन्द्रियतृप्ति की ओर है। फलत: सारे विश्व में पर्याप्त आर्थिक उन्नति के बावजूद मानव-समाज के आचार-विचार पशुतुल्य हैं। जब सब कुछ नितान्त पशुतुल्य हो जाता है, तो प्रलय होता है। इस प्रलय को ईश विध्वंसिताशिषाम् के रूप में ग्रहण करना चाहिए। भगवान् द्वारा प्रदत्त आर्थिक विकास तथा इन्द्रियतृप्ति का आशीर्वाद अन्त में विनष्ट हो जाता है। इस कलियुग के अन्त में भगवान् कल्कि अवतार के रूप में प्रकट होंगे और उनका एकमात्र कार्य होगा ब्रह्माण्ड के समस्त मनुष्यों का संहार। इस नरसंहार के बाद पुन: स्वर्णिम युग आएगा। अत: हमें जान लेना होगा कि हमारे सारे भौतिक कार्यकलाप बच्चों की खिलवाड़ सदृश हैं। बच्चे समुद्रतट पर खेल करते हैं, पिता तट पर बैठा-बैठा बच्चों के द्वारा महलों का दीवालों का बनना आदि देखता रह सकता है, किन्तु अन्त में पिता के कहने पर बच्चों को सब कुछ छोडक़र घर वापस आना पड़ता है। तब सब कुछ नष्ट हो जाता है। जो लोग आर्थिक विकास तथा इन्द्रियतृप्ति के बच्चों जैसे खिलवाड़ में लगे रहते हैं, कभी-कभी भगवान् उन पर विशेष अनुग्रह करके उनके सारे निर्माण कार्यों को विनष्ट कर देते हैं।

भगवान् ने कहा है—यस्याहमनुगृह्णामि हरिष्ये तद्धनं शनै:। भगवान् ने युधिष्ठिर महाराज से कहा कि जब वे अपने भक्त पर विशेष अनुकम्पा करते हैं, तो उसका सारा धन-वैभव हर लेते हैं। अत: सामान्यत: यह देखा जाता है कि वैष्णव अधिक धनवान नहीं होते। जब कोई वैष्णव या भक्त धनवान होने के साथ-साथ परमेश्वर की सेवा करने की इच्छा व्यक्त करता है, तो उसकी भक्ति अवरुद्ध हो जाती है। भगवान् उस पर कृपा प्रदर्शित करने के लिए उसकी तथाकथित आर्थिक उन्नति तथा भौतिक ऐश्वर्य को विनष्ट कर देते हैं। इस प्रकार भक्त बारम्बार आर्थिक उन्नति करने के प्रयासों से निराश होकर अन्तत: भगवान् के चरणकमलों की शरण ग्रहण करता है। ऐसा कार्य भी ईशविध्वंसिताशिषाम् माना जा सकता है, जिसके द्वारा भगवान् मनुष्य के ऐश्वर्य को नष्ट करके उसे आध्यात्मिक ज्ञान से सम्पन्न करते हैं। उपदेश देते समय हमने देखा है कि भौतिकतावादी व्यक्ति हमारे पास आते हैं और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए नमस्कार करते हैं, जिसका अर्थ होता है कि वे और अधिक भौतिक ऐश्वर्य की इच्छा रखते हैं। यदि उनकी इस प्रकार की ऐश्वर्य-इच्छा को रोका जाये तो ऐसे व्यक्ति भक्तों को कभी नमस्कार भी न करना चाहें। ऐसे भौतिकतावादी पुरुष केवल अपनी आर्थिक प्रगति से नाता रखते हैं। वे सन्तों या परमेश्वर को प्रणाम करते हैं और उपदेश कार्य के लिए कुछ दान देते हैं जिससे उन्हें और आर्थिक लाभ हो सके।

किन्तु यदि कोई अपनी भक्ति में एकनिष्ठ है, तो भगवान् उस भक्त को अपनी आर्थिक प्रगति त्यागने के लिए बाध्य करते हैं और अपने प्रति पूर्ण समर्पण करा लेते हैं। चूँकि भगवान् अपने भक्त को ऐश्वर्य का वरदान नहीं देते, अत: लोग भगवान् विष्णु की पूजा करने से डरते हैं, क्योंकि वे देखते हैं कि भगवान् विष्णु को पूजने वाले वैष्णव धनी नहीं होते। किन्तु ऐसे भौतिकतावादी पुरुष शिवजी की उपासना करके धन प्राप्त करने के अनेक अवसर प्राप्त कर सकते हैं, क्योंकि शिवजी देवी दुर्गा के पति हैं, जो इस ब्रह्माण्ड की अधिष्ठात्री हैं। शिवजी के अनुग्रह से ऐसे भक्त को देवी दुर्गा से आशीर्वाद प्राप्त करने का सुयोग प्राप्त होता है। उदाहरणार्थ, रावण शिवजी का महान् उपासक तथा भक्त था जिसके बदले में उसे देवी दुर्गा के समस्त वर प्राप्त थे, यहाँ तक कि उसके सारे साम्राज्य के भवन स्वर्ण निर्मित थे। इस युग में ब्राजील में स्वर्ण की अथाह राशि मिली है और पुराणों में प्राप्त ऐतिहासिक सन्दर्भों से हम यह अन्दाजा लगा सकते हैं कि यह रावण का साम्राज्य था। किन्तु भगवान् रामचन्द्र द्वारा यह सम्राज्य को ध्वस्त कर दिया गया था।

ऐसी घटनाओं के अध्ययन से हम ईश-विध्वंसिताशिषाम् का पूरा अर्थ समझ सकते हैं। भगवान् कभी अपने भक्तों को भौतिक आशीष नहीं देते, क्योंकि इससे वे संसार में जन्म, मृत्यु, जरा तथा रोग के चक्र में पुन: उलझ जाएँगे। भौतिक ऐश्वर्य से रावण-जैसे व्यक्ति इन्द्रिय तृप्ति के लिए फूल उठते हैं। रावण ने सीता का, जो भगवान् रामचन्द्र की पत्नी तथा ऐश्वर्य की देवी थीं, यह सोचकर अपहरण करने का दु:साहस किया कि वह भगवान् की ह्लादिनी शक्ति को भोग सकेगा। किन्तु वास्तव में ऐसे कार्य से रावण विनष्ट हो गया। आज के समय की मानवीय सभ्यता आर्थिक उन्नति तथा इन्द्रियतृप्ति के प्रति इतनी अधिक आसक्त है कि वह विनाश के कगार पर खड़ी है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥