श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 22: चारों कुमारों से पृथु महाराज की भेंट  »  श्लोक 39

 
श्लोक
यत्पादपङ्कजपलाशविलासभक्त्या
कर्माशयं ग्रथितमुद्ग्रथयन्ति सन्त: ।
तद्वन्न रिक्तमतयो यतयोऽपि रुद्ध
स्रोतोगणास्तमरणं भज वासुदेवम् ॥ ३९ ॥
 
शब्दार्थ
यत्—जिसके; पाद—चरण; पङ्कज—कमल; पलाश—पंखुडिय़ाँ या अंगूठे; विलास—भोग; भक्त्या—भक्ति से; कर्म— सकाम कर्म; आशयम्—इच्छा; ग्रथितम्—कठोर ग्रंथि; उद्ग्रथयन्ति—समूल नष्ट कर देते हैं; सन्त:—भक्तजन; तत्—उसके; वत्—सदृश; न—कभी नहीं; रिक्त-मतय:—भक्ति से रहित मनुष्य; यतय:—अधिकाधिक प्रयत्न करके; अपि—यद्यपि; रुद्ध—बन्द; स्रोत:-गणा:—इन्द्रियसुख की लहरें; तम्—उसको; अरणम्—शरण ग्रहण करने योग्य; भज—भक्ति में लगो; वासुदेवम्—वसुदेव के पुत्र श्रीकृष्ण की ।.
 
अनुवाद
 
 जो भक्तजन नित्य ही भगवान् के चरणकमलों के अँगुष्ठों की सेवा में रत रहते हैं, वे सकाम कर्म की जोर से बँधी गाँठ जैसी इच्छाओं को सरलता से लाँघ जाते हैं। चूँकि ऐसा कर पाना दु:साध्य है, अत: अभक्तजन—ज्ञानी तथा योगी—इन्द्रियतृप्ति की तरंगों को रोकने का प्रयास करके भी ऐसा नहीं कर पाते। अत: तुम्हें आदेश है कि तुम वसुदेव के पुत्र श्रीकृष्ण की भक्ति में लग जाओ।
 
तात्पर्य
 तीन प्रकार के अध्यात्मवादी—ज्ञानी, कर्मी तथा भक्त—प्रकृति के गुणों के प्रभाव पर काबू पाने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। ये सभी इन्द्रियों के प्रभाव को, जो नदी की निरन्तर लहरों के समान हैं, जीतने का प्रयत्न करते हैं। नदी की लहरें अनवरत उठती रहती हैं, उन्हें रोक पाना दुष्कर होता है। इसी प्रकार भौतिक सुख की इच्छा की लहरें भी इतनी प्रबल होती हैं कि उन्हें भक्तियोग के अतिरिक्त अन्य किसी उपाय से नहीं रोका जा सकता। भक्तजन भगवान् के चरणकमलों के प्रति अपनी दिव्य भक्ति के कारण दिव्य आनन्द से इतने अभिभूत हो जाते हैं कि उनकी भौतिक सुख की इच्छाएँ स्वयमेव रुक जाती हैं। ज्ञानी तथा योगी भगवान् के चरणकमलों में आसक्त न होने के कारण इच्छा की तरंगों से संघर्ष करते रहते हैं। उन्हें इस श्लोक में रिक्तमतय: कहा गया है, जिसका अर्थ है भक्ति से विहीन। दूसरे शब्दों में, यद्यपि ज्ञानी तथा योगी भौतिक कर्मों की इच्छाओं से मुक्त होने का प्रयत्न करते हैं, किन्तु वस्तुत: वे इन्द्रियों के कार्यकलापों को रोकने के मिथ्या दार्शनिक चिन्तन या श्रमसाध्य प्रयत्नों में उलझते जाते हैं। जैसाकि पहले कहा जा चुका है (भागवत १.२.७)—
वासुदेवे भगवति भक्तियोग: प्रयोजित:।

जनयत्याशु वैराग्यं ज्ञानं च यदहैतुकम् ॥

यहाँ भी उसी बात पर बल है। भज वासुदेवम् बताता है कि जो वसुदेव के पुत्र श्रीकृष्ण की प्रेमाभक्ति में लगा रहता है, वह सरलता से इच्छा की तरंगों को रोक सकता है। जब तक इन तरंगों को कृत्रिम ढंग से रोकने का प्रयास होता रहेगा, उसे असफलता ही हाथ लगेगी। इस श्लोक में यही संकेत मिलता है। सकाम कर्म की इच्छाओं की जड़ें गहरी होती हैं, किन्तु इच्छा रूपी वृक्षों को भक्ति से पूर्ण रूप से उन्मूलित किया जा सकता है, क्योंकि भक्ति श्रेष्ठ इच्छा का प्रयोग करती है। श्रेष्ठ इच्छाओं में लगे रहने से निकृष्ट इच्छाओं को त्यागा जा सकता है, इच्छा को रोक पाना असम्भव है। निकृष्ट इच्छाओं में प्रवृत्त न हों, इसके लिए परमेश्वर की इच्छा करनी होती है। ज्ञानी लोग परमेश्वर से एकाकार होने की इच्छा बनाये रखते हैं, किन्तु ऐसी इच्छा को भी काम-वासना माना जाता है। इसी प्रकार से योगी योगशक्ति की कामना करते हैं, किन्तु वह भी काम-वासना है। किन्तु भक्त इच्छारहित होने के कारण पवित्र हो जाते हैं। उन्हें इच्छा रोकने के लिए किसी कृत्रिम उपाय की आवश्यकता नहीं पड़ती। भगवान् के चरणकमलों के अँगूठों के संरक्षण में इच्छाएँ आध्यात्मिक सुख की साधन बन जाती हैं। यहाँ कुमारों द्वारा यह बताया गया है कि भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमल समस्त सुखों (आनन्द) के आगार हैं। अत: वृथा ही भौतिक सुख के लिए इच्छाओं को रोकने का विफल प्रयास करने के बजाय मनुष्य को चाहिए कि भगवान् के चरणकमलों की शरण ग्रहण करे। जब तक वह भौतिक सुख के लिए इच्छाओं को रोकने में असमर्थ रहता है, तब तक इस संसार के बन्धन से मुक्त होने की कोई सम्भावना नहीं रहती। यह तर्क किया जा सकता है कि नदी की तरंगें लगातार समुद्र की ओर बहती रहती हैं और उन्हें रोका नहीं जा सकता। जब ज्वार आता है, तो इससे नदी की धारा रुद्ध हो जाती है और स्वयं नदी में बाढ़ आ जाती है। उस समय समुद्र की लहरें नदी की लहरों से अधिक मुखर हो उठती हैं। इसी प्रकार बुद्धिमान भक्त कृष्णचेतना में भगवान् की सेवा के हेतु कई तरह की योजनाएँ बनाता है, जिससे अचल भौतिक इच्छाएँ भगवान् की सेवा की इच्छाओं से आप्लावित हो जाती हैं। जैसाकि यामुनाचार्य ने पुष्टि की है कि जब से वे भगवान् के चरणकमलों की सेवा की ओर उन्मुख हुए, तब से नित्य ही भगवान् की सेवा करने की नवीन से नवीन इच्छाएँ उठती रहती हैं, जिसके फलस्वरूप विषयी जीवन की अचल इच्छा तुच्छ पड़ गई है। वे तो यहाँ तक कहते हैं कि वे ऐसी इच्छाओं पर थूकते हैं। भगवद्गीता (२.५९) भी पुष्टि करती है—परं दृष्ट्वा निवर्तते—निष्कर्षत: भगवान् के चरणकमलों की सेवा के लिए प्रेमपूर्ण इच्छा विकसित करने से इन्द्रियतृप्ति की सारी इच्छाएँ दमित हो सकती हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥