श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 22: चारों कुमारों से पृथु महाराज की भेंट  »  श्लोक 44

 
श्लोक
प्राणा दारा: सुता ब्रह्मन् गृहाश्च सपरिच्छदा: ।
राज्यं बलं मही कोश इति सर्वं निवेदितम् ॥ ४४ ॥
 
शब्दार्थ
प्राणा:—प्राण, जीवन; दारा:—स्त्री; सुता:—सन्तानें; ब्रह्मन्—हे ब्राह्मण; गृहा:—घर; च—भी; स—सहित; परिच्छदा:— समस्त सामग्री; राज्यम्—राज्य; बलम्—शक्ति, सेना; मही—धरती; कोश:—खजाना; इति—इस प्रकार; सर्वम्—सब कुछ; निवेदितम्—अर्पित ।.
 
अनुवाद
 
 राजा ने आगे कहा : अत: हे ब्राह्मणो, मेरा प्राण, पत्नी, बच्चे, घर, घर का साज-सामान, मेरा राज्य, सेना, पृथ्वी तथा विशेष रूप से मेरा राजकोष—ये सब आपको अर्पित हैं।
 
तात्पर्य
 दारा: के स्थान पर कहीं-कहीं राय: पाठ मिलता है, जिसका अर्थ होता है “सम्पत्ति।” भारत में अब भी ऐसे धनी व्यक्ति हैं, जो राज्य द्वारा राय के रूप में सम्मानित हैं। भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु का एक महान् भक्त रामानन्द राय कहलाता था, क्योंकि यह मद्रास का राज्यपाल था और अत्यन्त धनी था। अब भी अनेक राय उपाधिधारी हैं—राय बहादुर, राय चौधरी इत्यादि। दारा: अर्थात् पत्नी को ब्राह्मणों को दिये जाने की अनुमति नहीं है। दान के पात्र को सब कुछ प्रदान किया जाता है, किन्तु कहीं भी यह नहीं पाया जाता कि पत्नी दान में दी जाये; अत: यहाँ पर दारा: के स्थान पर राय: पाठ अधिक उपयुक्त है। यही नहीं, चूँकि पृथु महाराज ने कुमारों को सर्वस्व अर्पित कर दिया, अत: कोश: (खजाना) का पृथक् उल्लेख नहीं होना चाहिए था। राजे तथा महाराजे अपना निजी कोश रखते थे जिसे रत्न-भाण्ड कहा जाता था। रत्न-भाण्ड विशेष प्रकार का कोश-कक्ष होता था जिसमें विशेष प्रकार के हीरे-जवाहरात तथा चूडिय़ाँ,
हार इत्यादि रखे जाते थे और ये नागरिकों द्वारा राजा को भेंटस्वरूप प्राप्त होते थे। ये हीरे-जवाहरात नियमित कोश से पृथक् रखे जाते थे जिसमें भूमि-कर आदि संचित होता था। इस प्रकार पृथु महाराज ने कुमारों के चरणकमलों में अपना निजी कोष (हीरे जवाहरात) अर्पित कर दिया। यह पहले ही स्वीकार किया जा चुका है कि राजा पृथु की सारी सम्पत्ति ब्राह्मणों की थी। वह तो राज्य के कल्याण के लिए उसका उपयोग कर रहा था। यदि यह सम्पत्ति वास्तव में ब्राह्मणों की थी तो वह किस प्रकार पुन: उन्हें प्रदान की जा सकती है? इस सम्बन्ध में श्रीपाद श्रीधर स्वामी ने व्याख्या की है कि यह भेंट तो वैसी है जैसे दास द्वारा अपने स्वामी को दिया गया भोजन। भोजन पहले से स्वामी का होता है, क्योंकि वह उसके द्वारा खरीदा हुआ होता है, किन्तु सेवक भोजन बनाकर स्वामी के खाने योग्य बनाता है और उसे प्रदान करता है। इस तरह पृथु महाराज के पास जो कुछ था, उसे उन्होंने कुमारों को अर्पित कर दिया।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥