श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 22: चारों कुमारों से पृथु महाराज की भेंट  »  श्लोक 52

 
श्लोक
गृहेषु वर्तमानोऽपि स साम्राज्यश्रियान्वित: ।
नासज्जतेन्द्रियार्थेषु निरहंमतिरर्कवत् ॥ ५२ ॥
 
शब्दार्थ
गृहेषु—घर में; वर्तमान:—उपस्थित; अपि—यद्यपि; स:—राजा पृथु; साम्राज्य—पूरा राज्य; श्रिया—ऐश्वर्य; अन्वित:—लीन; न—कभी नहीं; असज्जत—आकर्षित हुआ; इन्द्रिय-अर्थेषु—इन्द्रियतृप्ति हेतु; नि:—न तो; अहम्—मैं हूँ; मति:—विचार; अर्क—सूर्य; वत्—सदृश ।.
 
अनुवाद
 
 महाराज पृथु, जो अपने सारे साम्राज्य की सम्पत्ति के कारण अत्यन्त ऐश्वर्यवान् थे, घर में एक गृहस्थ की भाँति रहते थे। चूँकि वे अपने ऐश्वर्य का उपयोग अपनी इन्द्रियतृप्ति के हेतु कभी नहीं करना चाहते थे, अत: वे विरक्त बने रहे, जिस प्रकार कि सूर्य सभी परिस्थितियों में अप्रभावित रहता है।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में गृहेषु शब्द महत्त्वपूर्ण है। चारों आश्रमों—ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास में से केवल गृहस्थ को ही स्त्री-प्रसंग की अनुमति है, अत: गृहस्थाश्रम में एक प्रकार से भक्त के लिए इन्द्रियतृप्ति की छूट है। तो भी पृथु महाराज विशिष्ट थे, क्योंकि गृहस्थ बने रहने की छूट होने और साम्राज्य का विपुल ऐश्वर्य रहने पर भी वे कभी इन्द्रियतृप्ति में प्रवृत्त नहीं हुए। यह विशेष लक्षण था, जो उनके भगवान् के विशुद्ध भक्त होने का सूचक था। शुद्ध भक्त कभी भी इन्द्रियतृप्ति के प्रति आकृष्ट नहीं होता, फलस्वरूप वह मुक्त रहता है। भौतिक जीवन में मनुष्य अपनी संतुष्टि के लिए इन्द्रितृप्ति में प्रवृत्त होता है, किन्तु भक्ति या मुक्त जीवन में उसका लक्ष्य भगवान् की इन्द्रियों को तुष्ट करना होता है।
इस श्लोक में महाराज पृथु की उपमा सूर्य से दी गई है (अर्कवत्)। कभी-कभी सूर्य मूत्र, मल तथा अन्य दूषित वस्तुओं पर चमकता है, किन्तु सर्वशक्तिमान होने के कारण वह इन दूषित वस्तुओं के सम्पर्क में आकर भी प्रभावित नहीं होता। उल्टे सूर्य-प्रकाश दूषित तथा गंदी जगहों को विशुद्ध और कीटाणु-रहित करता है। इसी प्रकार भले भी भक्त नाना प्रकार के भौतिक कार्यकलापों में प्रवृत्त हो, किन्तु इन्द्रियतृप्ति की इच्छा न होने से वह उनसे कभी प्रभावित नहीं होता। विपरित इसके वह समस्त भौतिक कार्यकलापों को भगवान् की सेवा की ओर मोड़ देता है। चूँकि शुद्ध भक्त जानता है कि किस प्रकार हर वस्तु को भगवान् की सेवा में लगाया जाये, अत: वह भौतिक कार्यकलापों से सदा अप्रभावित रहता है। उन्हें वह अपनी दिव्य योजनाओं से ऐसे कार्यकलापों को पवित्र बना देता है। इसका वर्णन भक्तिरसामृत-सिन्धु में हुआ है। सर्वोपाधि विनिर्मुक्तं तत्परत्वेन निर्मलम्—उसका लक्ष्य भौतिक उपाधियों से प्रभावित हुए बिना भगवान् की सेवा में पूर्ण रूप से पवित्र हो जाना है।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥