श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 22: चारों कुमारों से पृथु महाराज की भेंट  »  श्लोक 53

 
श्लोक
एवमध्यात्मयोगेन कर्माण्यनुसमाचरन् ।
पुत्रानुत्पादयामास पञ्चार्चिष्यात्मसम्मतान् ॥ ५३ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार; अध्यात्म-योगेन—भक्तियोग के द्वारा; कर्माणि—कर्म; अनु—सदैव; समाचरन्—करते हुए; पुत्रान्—पुत्रों को; उत्पादयाम् आस—उत्पन्न किया; पञ्च—पाँच; अर्चिषि—अपनी पत्नी अर्चि से; आत्म—निजी; सम्मतान्—इच्छा के अनुसार ।.
 
अनुवाद
 
 भक्ति की मुक्त अवस्था में स्थित होकर पृथु महाराज ने न केवल समस्त सकाम कर्मों को सम्पन्न किया, अपितु अपनी पत्नी अर्चि से पाँच पुत्र भी उत्पन्न किये। निस्सन्देह, उनके सारे पुत्र उनकी निजी इच्छानुसार उत्पन्न हुए थे।
 
तात्पर्य
 गृहस्थ के रूप में पृथु महाराज को अपनी पत्नी अर्चि से पाँच पुत्र प्राप्त हुए और ये पाँचों पुत्र उनकी इच्छानुसार उत्पन्न हुए थे। वे किसी सनक या संयोग से नहीं उत्पन्न हुए थे। अपनी इच्छानुसार किस प्रकार सन्तान उत्पन्न की जाये, इस युग (कलियुग) में एक प्रकार से अज्ञात है। इसका रहस्य पति-पत्नी द्वारा शुद्धि-विधियों का, जिन्हें संस्कार कहते हैं, अपनाया जाना है। इन संस्कारों में से पहला संस्कार गर्भाधान संस्कार है, जो विशेष रूप से उच्च वर्णों—ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों—के लिए अनिवार्य है। जैसाकि भगवद्गीता में कहा गया है कि जो स्त्री-प्रसंग धर्म के विपरीत नहीं रहता वह स्वयं श्रीकृष्ण है। धार्मिक नियमों के अनुसार जब कोई सन्तान उत्पन्न करना चाहे तो उसे संभोग के पूर्व गर्भाधान-संस्कार सम्पन्न करना चाहिए। संभोग के पूर्व माता-पिता की जैसी मानसिकता होती है उसका प्रभाव निश्चित रूप से उत्पन्न
होने वाली सन्तान की मानसिकता पर पड़ेगा। हो सकता है कामवश उत्पन्न की गई सन्तान माता-पिता की आशा के अनुरूप न निकले। शास्त्रों का कथन है—यथा योनिर्यथा बीजम्। यथा योनि: से माता का संकेत है और यथा बीजम् से पिता का। यदि संभोग के पूर्व माता-पिता की मानसिक दशा सुस्थिर है, तो उनसे जो सन्तान उत्पन्न होगी वह अवश्य ही उनकी मानसिक दशा को प्रतिबिम्बित करेगी। अत: आत्मसम्मतान् शब्दों से लक्षित होता है कि सन्तान उत्पन्न करने के पूर्व पृथु महाराज तथा अर्चि ने गर्भाधान-संस्कार सम्पन्न किया होगा, फलत: उनके सारे पुत्र उनकी इच्छाओं तथा विशुद्ध मानसिक दशाओं वाले उत्पन्न हुए। पृथु महाराज ने काम के वशी भूत होकर पुत्रों को जन्म नहीं दिया। न ही वे इन्द्रियतृप्ति हेतु अपनी पत्नी के प्रति आकृष्ट हुए थे। उन्होंने गृहस्थ के रूप में सारे विश्व में भविष्य में अपना शासन चलाने के लिए पुत्र उत्पन्न किये।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥