श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 22: चारों कुमारों से पृथु महाराज की भेंट  »  श्लोक 62

 
श्लोक
बृहस्पतिर्ब्रह्मवादे आत्मवत्त्वे स्वयं हरि: ।
भक्त्या गोगुरुविप्रेषु विष्वक्सेनानुवर्तिषु ।
ह्रिया प्रश्रयशीलाभ्यामात्मतुल्य: परोद्यमे ॥ ६२ ॥
 
शब्दार्थ
बृहस्पति:—स्वर्गलोक के पुरोहित; ब्रह्म-वादे—आध्यात्मिक ज्ञान में; आत्म-वत्त्वे—आत्म-नियंत्रण के मामले में; स्वयम्— साक्षात्; हरि:—श्रीभगवान्; भक्त्या—भक्ति में; गो—गाय; गुरु—गुरु; विप्रेषु—ब्राह्मणों में; विष्वक्सेन—भगवान्; अनुवर्तिषु—अनुयायी; ह्रिया—लज्जा से; प्रश्रय-शीलाभ्याम्—अत्यन्त भद्र आचरण से; आत्म-तुल्य:—अपने ही समान आप; पर-उद्यमे—परोपकारी कार्यों में ।.
 
अनुवाद
 
 पृथु महाराज के निजी आचरण में समस्त उत्तम गुण प्रकट होते थे। अपने आत्म-ज्ञान में वे ठीक बृहस्पति के समान थे। आत्म-नियंत्रण (इन्द्रियजय) में वे साक्षात् भगवान् के समान थे। जहाँ तक भक्ति का प्रश्न था, वे भक्तों के परम अनुयायी थे। जो गो-रक्षा के प्रति आसक्त और गुरु तथा ब्राह्मणों की सारी सेवा करते थे। वे परम सलज्ज थे और उनका आचरण अत्यन्त भद्र था। जब वे किसी परोपकार में लग जाते तो इस प्रकार कार्य करते थे मानो अपने लिए ही कार्य कर रहे हों।
 
तात्पर्य
 भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु ने सार्वभौम भट्टाचार्य से बात करने के बाद उन्हें बृहस्पति का अवतार कह कर सम्मानित किया था। बृहस्पति स्वर्गलोक के प्रमुख पुरोहित हैं और ब्रह्मवाद या मायावाद दर्शन के अनुयायी हैं। बृहस्पति महान् तर्क-शास्त्री भी हैं। इस कथन से प्रतीत होता है कि यद्यपि महाराज पृथु भगवान् की प्रेमाभक्ति में रहने वाले महान् भक्त थे, किन्तु वे अपने वैदिक शास्त्रों के गम्भीर ज्ञान के बल पर सभी प्रकार के निर्विशेषवादियों तथा मायावादियों को परास्त कर सकते थे। हमें महाराज पृथु से सीखना चाहिए कि एक वैष्णव या भक्त को न केवल भगवद्भक्ति में स्थिर रहना चाहिए, वरन् आवश्यकता पडऩे पर निर्विशेषवादियों से तर्क करने तथा उन्हें इस मतपर कि परम सत्य निर्विशेष है, परास्त करने के लिए तैयार रहना चाहिए।
भगवान् आदर्श आत्मजयी या ब्रह्मचारी हैं। जब महाराज युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण को अपने द्वारा सम्पन्न किये जाने वाले राजसूय यज्ञ का अध्यक्ष चुना तो भीष्म पितामह ने श्रीकृष्ण को सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मचारी कहकर प्रशंसा की थी। चूँकि भीष्म पितामह स्वयं ब्रह्मचारी थे, अत: वे व्यभिचारी तथा ब्रह्मचारी में अन्तर बताने के लिए सर्वथा उपयुक्त थे। यद्यपि पृथु महाराज गृहस्थ और पाँच पुत्रों के पिता थे, फिर भी वे परम आत्मसंयमी माने जाते थे। जो व्यक्ति मानवता के लाभ हेतु कृष्णभक्त-पुत्र उत्पन्न करता है, वही वास्तविक ब्रह्मचारी है। जो कुत्ते-बिल्लियों की तरह सन्तान उत्पन्न करते हैं, वे उपयुक्त पिता नहीं हैं। ब्रह्मचारी शब्द ब्रह्म पद से कार्य करने या भक्ति करने वाले के लिए भी आता है। निर्गुण ब्रह्म विचार में कोई गतिशीलता नहीं होती, किन्तु जब भगवान् के सम्बन्ध में कोई कार्य करता है, तो वह ब्रह्मचारी कहलाता है। इस प्रकार पृथु महाराज एकसाथ आदर्श ब्रह्मचारी तथा गृहस्थ थे। विष्वक्सेनानुवर्तिषु उन भक्तों का सूचक है, जो भगवान् की सेवा में निरन्तर लगे रहते हैं। अन्य भक्तों को भी इनका अनुसरण करना चाहिए। श्रील नरोत्तमदास ठाकुर ने कहा है—एइ छय गोसाञि याँर, मुञि ताँर दास—वे छहों गोस्वामियों के पदचिह्नों पर चलने वाले किसी का भी शिष्य बनने को तैयार हैं।

यही नहीं, समस्त वैष्णवों की भाँति महाराज पृथु गो-रक्षा, गुरुओं तथा योग्य ब्राह्मणों के प्रति श्रद्धालु थे। वे अत्यन्त विनम्र तथा भद्र भी थे और जब भी वे जनता के लिए कोई परोपकारी या कल्याणकारी कार्य करते तो वे उसी प्रकार परिश्रम करते मानो वह उनका निजी कार्य हो। दूसरे शब्दों में, उनके परोपकारी कार्य दिखावे के लिए नहीं होते थे, अपितु निजी भावना तथा निष्ठा से किये जाते थे। समस्त परोपकारी कार्य इसी तरह किये जाने चाहिए।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥