श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 22: चारों कुमारों से पृथु महाराज की भेंट  »  श्लोक 63

 
श्लोक
कीर्त्योर्ध्वगीतया पुम्भिस्त्रैलोक्ये तत्र तत्र ह ।
प्रविष्ट: कर्णरन्ध्रेषु स्त्रीणां राम: सतामिव ॥ ६३ ॥
 
शब्दार्थ
कीर्त्या—कीर्ति से; ऊर्ध्व-गीतया—उच्च घोषणा द्वारा; पुम्भि:—सामान्य जनता द्वारा; त्रै-लोक्ये—ब्रह्माण्ड भर में; तत्र तत्र— सर्वत्र; ह—निश्चय ही; प्रविष्ट:—प्रवेश करते हुए; कर्ण-रन्ध्रेषु—कान के छेदों में; स्त्रीणाम्—स्त्रियों के; राम:—भगवान् रामचन्द्र; सताम्—भक्तों के; इव—सदृश ।.
 
अनुवाद
 
 सारे ब्रह्माण्ड भर में—उच्चतर, निम्नतर तथा मध्य लोकों में—पृथु महाराज की कीर्ति उच्च स्वर से घोषित की जा रही थी। सभी महिलाओं तथा साधु पुरुषों ने उनकी महिमा को सुना जो भगवान् रामचन्द्र की महिमा के समान मधुर थी।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में स्त्रीणाम् तथा राम: शब्द महत्त्वपूर्ण हैं। स्त्रियाँ कुछ वीरों की प्रशंसा को बड़े ही ध्यान से सुनती और उसका आनन्द लेती हैं। इस श्लोक से लगता है कि पृथु महाराज की ख्याति इतनी व्यापक थी कि ब्रह्माण्ड-भर की स्त्रियाँ उसे अत्यन्त चाव से सुनती थीं। साथ ही उनकी महिमा ब्रह्माण्ड भर में भक्तों को भी सुनाई पड़ती थी जो भगवान् रामचन्द्र की महिमा के ही समान सुख देने वाली थी। भगवान् रामचन्द्र का राज्य आज भी विद्यमान है और भारत में तो
रामराज्य दल नामक राजनीतिक दल भी बन गया था, जो राम के राज्य के ही समान राज्य स्थापित करना चाहता था। दुर्भाग्यवश आधुनिक राजनीतिज्ञ रामराज्य तो चाहते हैं, किन्तु राम से विहीन। यद्यपि उन्होंने ईश्वरभक्ति के विचार को समाप्त कर दिया है, तो भी वे रामराज्य स्थापित करना चाहते हैं। ऐसे प्रस्ताव भक्तों को अमान्य हैं। पृथु महाराज की ख्याति साधु पुरुषों द्वारा इसलिए सुनी जाती थी, क्योंकि वे आदर्श राजा रामचन्द्र का ही प्रतिनिधित्व करते थे।
 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के चतुर्थ स्कन्ध के अन्तर्गत “चारों कुमारों से पृथु महाराज की भेंट” नामक बाईसवें अध्याय के भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥