श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 22: चारों कुमारों से पृथु महाराज की भेंट  »  श्लोक 7

 
श्लोक
पृथुरुवाच
अहो आचरितं किं मे मङ्गलं मङ्गलायना: ।
यस्य वो दर्शनं ह्यासीद्दुर्दर्शानां च योगिभि: ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
पृथु: उवाच—राजा पृथु ने कहा; अहो—हे भगवान्; आचरितम्—अभ्यास; किम्—क्या; मे—मेरे द्वारा; मङ्गलम्—कल्याण; मङ्गल-आयना:—हे साक्षात् कल्याण; यस्य—जिससे; व:—तुम्हारा; दर्शनम्—दर्शन; हि—निश्चय ही; आसीत्—सम्भव हो सका; दुर्दर्शानाम्—कठिनाई से दृश्य, दुर्लभ; च—भी; योगिभि:—योगियों द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 राजा पृथु ने कहा : हे साक्षात् कल्याणमूर्ति महामुनियो, आपका दर्शन तो योगियों के लिए भी दुर्लभ है। निस्सन्देह आपका दर्शन दुर्लभ है। मैं नहीं जानता कि मुझसे ऐसा कौन-सा पुण्य बन पड़ा है, जिससे आप मेरे समक्ष इतनी सहजता से प्रकट हुए हैं।
 
तात्पर्य
 जब किसी के आध्यात्मिक जीवन में कुछ असाधारण घटना घटती है, तो यह समझना चाहिए कि किसी अज्ञात-सुकृति अर्थात् किसी अज्ञात पुण्य कर्म से ऐसा हुआ है। भगवान् या उनके शुद्ध भक्त का दर्शन प्राप्त कर पाना कोई साधारण घटना नहीं है। जब ऐसी घटनाएँ घटें तो इन्हें पूर्व पुण्यकर्मों का परिणाम समझना चाहिए जिसकी पुष्टि भगवद्गीता (७.२८) में हुई है—येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्। जो व्यक्ति समस्त पापकर्मों के फलों से मुक्त हो जाता है और केवल पुण्यकर्मों
में लगा रहता है, वही भक्ति में प्रवृत्त हो सकता है। यद्यपि महाराज पृथु का जीवन पुण्यकर्मों से ओतप्रोत था, तो भी उन्हें आश्चर्य हो रहा था कि उन्हें कुमारों के दर्शन किस प्रकार हो सके। उन्हें इसका अनुमान ही नहीं हो रहा था कि उन्होंने किस प्रकार के पुण्यकर्म किये होंगे। यह राजा पृथु की विनयशीलता का चिह्न है, जिन का जीवन पुण्यकर्मों के कारण इतना भरा हुआ था कि उनको भगवान् विष्णु तक ने दर्शन दिये थे और भविष्यवाणी की थी कि कुमार भी उन्हें दर्शन देंगे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥