श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 23: महाराज पृथु का भगवद्धाम गमन  »  श्लोक 11

 
श्लोक
तस्यानया भगवत: परिकर्मशुद्ध
सत्त्वात्मनस्तदनुसंस्मरणानुपूर्त्या ।
ज्ञानं विरक्तिमदभून्निशितेन येन
चिच्छेद संशयपदं निजजीवकोशम् ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
तस्य—उसका; अनया—इससे; भगवत:—भगवान् का; परिकर्म—भक्ति के कार्य; शुद्ध—शुद्ध, दिव्य; सत्त्व—अस्तित्व; आत्मन:—मन का; तत्—परमेश्वर का; अनुसंस्मरण—निरन्तर स्मरण; अनुपूर्त्या—ठीक से किये जाने पर; ज्ञानम्—ज्ञान; विरक्ति—अनासक्ति; मत्—रखते हुए; अभूत्—प्रकट हुआ; निशितेन—उत्कट कार्यों से; येन—जिससे; चिच्छेद—पृथक् होते हैं; संशय-पदम्—संदेह की स्थिति; निज—अपनी; जीव-कोशम्—जीवात्मा का आवरण (कोश) ।.
 
अनुवाद
 
 निरन्तर भक्ति करते रहने से पृथु महाराज का मन शुद्ध हो गया, अत: वे भगवान् के चरणारविन्द का निरन्तर चिन्तन करने लगे। इससे वे पूरी तरह से विरक्त हो गये और पूर्णज्ञान प्राप्त करके समस्त संशयों से परे हो गये। इस तरह वे मिथ्या अहंकार तथा जीवन के भौतिक बोध से मुक्त हो गये।
 
तात्पर्य
 नारद पञ्चरात्र में भगवान् की भक्ति की उपमा महारानी से दी गई है। जब महारानी दर्शन देती हैं, तो अनेक सेविकाएँ उसके साथ रहती हैं। भक्ति की सेविकाएँ हैं—ऐश्वर्य, मुक्ति तथा योग शक्तियाँ। कर्मी लोग भौतिक सुख में बहुत लिप्त रहते हैं, ज्ञानी लोग भौतिक बन्धन से छुटकारा पाने के लिए इच्छुक रहते हैं और योगी आठ प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिए लालायित रहते हैं। नारद पंचरात्र से हमें ज्ञात होता है कि जिसे शुद्ध भक्ति की अवस्था प्राप्त हो जाती है उसे सकाम कर्मों से प्राप्त होने वाले समस्त ऐश्वर्य, दार्शनिक चिन्तन तथा योग अभ्यास भी प्राप्त हो जाते हैं। अत: श्रील बिल्वमंगल ठाकुर ने अपने कृष्णकर्णामृत में प्रार्थना की है, “हे भगवान्! यदि मुझमें आपके लिए अटूट भक्ति है, तो आप साक्षात् मेरे समक्ष प्रकट हों। फिर तो सकाम कर्मों के फल तथा दार्शनिक चिन्तन—धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष—ये सब मेरे अनुचर बनकर मेरे आदेश की प्रतीक्षा में खड़े रहेंगे।” भाव यह है कि ज्ञानी लोग ब्रह्मविद्या से संस्कारित होकर भौतिक प्रकृति के चंगुल से निकलने के लिए अधिक प्रयास करते हैं। किन्तु भक्त ही ऐसा है, जो अपनी भक्ति के बल पर स्वत: अपने भौतिक शरीर से विरक्त हो जाता है। जब भक्त का आध्यात्मिक शरीर व्यक्त होने लगता है तब वह वास्तव में दिव्य जीवन के कार्यों में प्रवेश कर जाता है।
इस समय हमारा सम्पर्क भौतिक शरीर, भौतिक मन तथा भौतिक बुद्धि से बना हुआ है, किन्तु जब हम इन भौतिक अवस्थाओं से मुक्त हो जाते हैं, तो हमारे बुद्धि, मन तथा आध्यात्मिक शरीर प्रकट होते हैं। उस अध्यात्मिक अवस्था में, भक्त को कर्म, ज्ञान तथा योग के सारे लाभ प्राप्त होते हैं। यद्यपि भक्त यौगिक प्रक्रिया प्राप्त करने के लिए कभी भी सकाम कर्मों अथवा दार्शनिक चिन्तन में नहीं लगता, किन्तु वे स्वत: उसके समक्ष सेवा हेतु प्रकट हो जातेऋऋ हैं। भक्त किसी प्रकार का भौतिक ऐश्वर्य नहीं चाहता किन्तु यह ऐश्वर्य उसके समक्ष अपने आप प्रकट हो जाता है। उसे इसके लिए प्रयास नहीं करना पड़ता। अपनी भक्ति के कारण वह स्वत: ब्रह्मभूत हो जाता है। जैसा पहले कहा जा चुका है, इसकी पुष्टि भगवद्गीता (१४.२६) में हुई है—

मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।

स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥

“जो पूर्ण भक्ति में रत है और सभी परिस्थितियों में अचूक बना रहता है, वह प्रकृति के गुणों को तुरन्त पार कर लेता है और ब्रह्म पद को प्राप्त होता है।”

नियमित भक्ति करते रहने के कारण भक्त को जीवन की दिव्य स्थिति प्राप्त होती है। उसका मन अध्यात्म में लगा रहने के कारण वह भगवान् के चरणकमलों के अतिरिक्त कुछ और सोच ही नहीं सकता। संस्मरण-अनुपूर्त्या शब्द का अर्थ यही है। भगवान् के चरणकमलों का निरन्तर चिन्तन करते हुए भक्त अविलम्ब शुद्ध सत्त्व में स्थित हो जाता है। शुद्ध सत्त्व वह पद है, जो सतोगुण समेत प्रकृति के गुणों से ऊपर होता है। इस भौतिक जगत में सतोगुण परम सिद्धि का सूचक है, किन्तु मनुष्य को इस गुण को भी लाँघकर शुद्ध सत्त्व अवस्था तक पहुँचना होता है, जहाँ भौतिक प्रकृति के तीनों गुण अपना प्रभाव नहीं दिखा सकते।

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने निम्नलिखित उदाहरण दिया है—यदि किसी की पाचन शक्ति प्रबल है, तो भोजन करने के पश्चात् उसके उदर में स्वत: इतनी अग्नि उत्पन्न हो जाती है कि बिना किसी ओषधि के सब कुछ पच सकता है। इसी प्रकार भक्ति की अग्नि इतनी प्रबल होती है कि भक्त को पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने या भौतिक आकर्षण से विरक्ति के लिए अलग से कुछ नहीं करना होता। ज्ञानी ज्ञान के विषय में दीर्घकाल तक विवेचन करते रहने से भौतिक आकर्षणों से विरक्त हो सकता है और अन्त में इस तरह ब्रह्मभूत अवस्था तक पहुँच सकता है, किन्तु भक्त को यह सब झंझट नहीं करनी पड़ती। अपनी भक्ति के बल पर वह बिना किसी शंका के ब्रह्मभूत अवस्था को प्राप्त होता है। योगी तथा ज्ञानी अपनी स्वाभाविक स्थिति के सम्बन्ध में सदैव संशयग्रस्त रहते हैं, इसीलिए वे अपने को गलती से परमेश्वर से एक हो जाने की सोचते रहते हैं। किन्तु भक्त का परमेश्वर से सम्बन्ध नि:संशय रूप से स्पष्ट रहता है और उसे तुरन्त समझ में आ जाता है कि उसकी स्थिति नितान्त दास की है। ज्ञानी तथा योगी भक्ति के बिना अपने को मुक्त समझ सकते हैं, किन्तु उनकी बुद्धि भक्त जितनी विमल नहीं होती। दूसरे शब्दों में, ज्ञानी तथा योगी जब तक भक्तों की स्थिति को प्राप्त नहीं हो लेते तब तक वास्तव में मुक्त नहीं हो सकते। श्रीमद्भागवत (१०.२.३२) का कथन है—

आरुह्य कृच्छ्रेन परं पदं तत: पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रिय:।

ज्ञानी तथा योगी ब्रह्मसाक्षात्कार के सर्वोच्च पद तक उठ सकते हैं, किन्तु भगवान् के चरणारविन्द के प्रति भक्ति के अभाव में वे पुन: भौतिक प्रकृति में आ गिरते हैं। अत: ज्ञान तथा योग को मुक्ति की असली विधि नहीं मान लेना चाहिए। महाराज पृथु ने भक्ति के द्वारा इन स्थितियों को स्वत: लाँघ लिया था। चूँकि वे भगवान् के शक्त्यावेश अवतार थे, अत: मुक्ति पाने के लिए उन्हें कुछ नहीं करना पड़ा।

वे पृथ्वी पर भगवान् की इच्छापूर्ति हेतु वैकुण्ठ लोक से आये थे, फलत: उन्हें ज्ञान, योग या कर्म किये बिना ही भगवान् के धाम को वापस जाना था। यद्यपि पृथु महाराज भगवान् के शुद्ध भक्त थे, फिर भी उन्होंने लोगों को जीवन के कर्तव्यों को सही ढंग से सम्पन्न करने तथा अन्तत: भगवान् के धाम वापस जाने की समुचित विधि सिखाने के लिए भक्ति की प्रक्रिया स्वीकार की।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥