श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 23: महाराज पृथु का भगवद्धाम गमन  »  श्लोक 27

 
श्लोक
तेषां दुरापं किं त्वन्यन्मर्त्यानां भगवत्पदम् ।
भुवि लोलायुषो ये वै नैष्कर्म्यं साधयन्त्युत ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
तेषाम्—उनके लिए; दुरापम्—प्राप्त करना कठिन, दुर्लभ; किम्—क्या; तु—लेकिन; अन्यत्—और कुछ; मर्त्यानाम्—मनुष्यों का; भगवत्-पदम्—भगवान् का राज्य; भुवि—संसार में; लोल—क्षणिक; आयुष:—जीवन अवधि; ये—वे; वै—निश्चय ही; नैष्कर्म्यम्—मोक्ष का मार्ग; साधयन्ति—पालन करते हैं; उत—सही सही ।.
 
अनुवाद
 
 इस संसार में प्रत्येक मनुष्य का जीवन-काल लघु है, किन्तु जो भक्ति में अनुरक्त हैं, वे भगवान् के धाम वापस जाते हैं, क्योंकि वे सचमुच मोक्ष के मार्ग पर होते हैं। ऐसे लोगों के लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं है।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता (९.३३) में भगवान् कृष्ण कहते हैं—अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्। यह संसार दुखों (असुखम् ) से पूर्ण है और साथ ही अनित्य है, अत: मनुष्य का एकमात्र कर्तव्य है कि वह अपने आपको भक्ति में लगाए। मानव जीवन का यही सर्वोत्तम अन्त है। जो भक्त भगवान् के चरणकमलों की सेवा में निरन्तर लगे रहते हैं उन्हें न केवल समस्त भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं, वरन् समस्त आत्मिक लाभ भी मिलते हैं, क्योंकि जीवन के अन्त समय में वे भगवान् के धाम वापस जाते हैं। उनके गन्तव्य को इस श्लोक में भगवत्-पदम् कहा गया है। पदम् शब्द का अर्थ है “धाम” है तथा भगवत् का अर्थ “भगवान् का।” इस प्रकार भक्तों का गन्तव्य भगवान् का धाम है।
इस श्लोक में नैष्कर्म्यम् शब्द भी महत्त्वपूर्ण है, जिसका अर्थ है “दिव्य ज्ञान।” जब तक मनुष्य दिव्य ज्ञान को प्राप्त करके भगवान् की भक्ति नहीं करता तब तक वह पूर्ण नहीं होता। सामान्यत: ज्ञान, योग तथा कर्म विधियों को जन्म-जन्मांतर करते रहने पर मनुष्य को भगवान् की शुद्ध भक्ति करने का अवसर प्राप्त होता है। यह अवसर शुद्ध भक्त की कृपा से ही मिलता है और इसी विधि से मनुष्य को मोक्ष प्राप्त हो सकता है। इस कथा के प्रसंग में देवताओं की पत्नियों को पश्चात्ताप हो रहा था क्योंकि यद्यपि उनका जन्म स्वर्ग में हुआ, उनकी आयु लाखों वर्ष की थी और उन्हें सारी सुविधाएँ प्राप्त थी, किन्तु वे पृथु महाराज तथा उनकी पत्नी के समान भाग्यशालिनी नहीं थी, क्योंकि वे उनसे भी ऊपर जा रहे थे। दूसरे शब्दों में, पृथु महाराज तथा उनकी पत्नी को स्वर्ग तथा यहाँ तक कि ब्रह्मलोक जाने की भी इच्छा नहीं थी, क्योंकि वे जिस पद को प्राप्त कर रहे थे वह अतुलनीय थी। भगवद्गीता (८.१६) में भगवान् पुष्टि करते हैं—आब्रह्मभुवनाल्लोका: पुनरावर्तिनोऽर्जुन—“इस ससार में उच्चतम लोक से लेकर निम्नतम लोक तक सभी दुख के स्थान हैं जहाँ जन्म-मृत्यु का चक्कर लगा रहता है।” दूसरे शब्दों में, यदि कोई उच्चतमलोक, ब्रह्मलोक, को भी जाता है, तो उसे पुन: जन्म तथा मृत्यु के कष्टों में लौटना पड़ता है। भगवद्गीता (९.२१) में भगवान् कृष्ण बलपूर्वक कहते हैं—

ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति।

“इस प्रकार जब वे स्वर्ग का इन्द्रिय-सुख भोग लेते हैं, तो वे इस मर्त्यलोक में पुन: वापस आ जाते हैं।” इस प्रकार पुण्यों के चुक जाने पर मनुष्य को पुन: अध:लोकों में आना पड़ता है और फिर से पुण्यकर्म शुरू करने होते हैं। इसीलिए श्रीमद्भागवत (१.५.१२) में कहा गया है— नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितम्—“जब तक भगवद्भक्ति प्राप्त न हो जाए मुक्ति का मार्ग तनिक भी सुरक्षित (बाधाहीन) नहीं होता।” यदि कोई निर्गुण ब्रह्मज्योति को प्राप्त कर भी ले तो भी इस भौतिक संसार में उसके आ गिरने की सम्भावना बनी ही रहती है। यदि ब्रह्मज्योति से नीचे गिरना सम्भव है, तो फिर सामान्य योगियों तथा कर्मियों का क्या कहना जो केवल उच्चतर भौतिक लोकों तक ही उठ पाते हैं? इस तरह उच्चतर लोकों के वासियों की पत्नियों ने कर्म, ज्ञान तथा योग के फल को अधिक नहीं सराहा।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥