श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 23: महाराज पृथु का भगवद्धाम गमन  »  श्लोक 38

 
श्लोक
वैचित्रवीर्याभिहितं महन्माहात्म्यसूचकम् ।
अस्मिन् कृतमतिमर्त्यं पार्थवीं गतिमाप्नुयात् ॥ ३८ ॥
 
शब्दार्थ
वैचित्रवीर्य—हे विचित्रवीर्य के पुत्र (विदुर); अभिहितम्—कहा गया; महत्—महान्; माहात्म्य—महानता; सूचकम्—उद्बुद्ध करने वाला; अस्मिन्—इसमें; कृतम्—किया हुआ; अति-मर्त्यम्—असामान्य; पार्थवीम्—पृथु महाराज के सम्बन्ध में; गतिम्— उन्नति, लक्ष्य; आप्नुयात्—प्राप्त करना चाहिए ।.
 
अनुवाद
 
 मैत्रेय मुनि ने आगे कहा : हे विदुर, मैंने यथासम्भव पृथु महाराज के चरित्र के विषय में बतलाया है, जो मनुष्य के भक्तिभाव को बढ़ाने वाला है। जो कोई भी इसका लाभ उठाता है, वह भी महाराज पृथु की तरह ही भगवान् के धाम को वापस जाता है।
 
तात्पर्य
 पिछले श्लोक में आया हुआ श्रावयेत् शब्द इंगित करता है कि मनुष्य को न केवल स्वयं पढऩा चाहिए वरन् अन्यों को भी पढऩे तथा सुनने के लिए प्रेरित करना चाहिए। यह उपदेश देना कहलाता है। चैतन्य महाप्रभु ने इस अभ्यास की संस्तुति की है—यारे देख, तारे कह ‘कृष्ण’-उपदेश (चैतन्य-चरितामृत, मध्य ७.१२८) “जिससे भी मिलो उससे कृष्ण द्वारा दिये गये उपदेशों के विषय में बातें करो या उसे कृष्ण के वृत्तान्त सुनाओ।” पृथु महाराज
की भक्ति का इतिहास भगवान् की लीलाओं के वृत्तान्त के समान ही शक्तिदायक है। मनुष्य को चाहिए कि भगवान् की लीलाओं तथा पृथु महाराज के कार्यकलापों में अन्तर न माने और जब भी अवसर मिले पृथु महाराज के विषय में सुनने के लिए अन्यों को प्रेरित करे। केवल अपने हित के लिए उनकी लीलाओं को नहीं पढ़े, अपितु अन्यों को भी उनके विषय में पढऩे तथा सुनने के लिए प्रेरित करे। इस तरह प्रत्येक व्यक्ति लाभान्वित हो सकता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥