श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 23: महाराज पृथु का भगवद्धाम गमन  »  श्लोक 9

 
श्लोक
सनत्कुमारो भगवान् यदाहाध्यात्मिकं परम् ।
योगं तेनैव पुरुषमभजत्पुरुषर्षभ: ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
सनत्-कुमार:—सनत्कुमार ने; भगवान्—अत्यन्त शक्तिशाली; यत्—जो; आह—कहा; आध्यात्मिकम्—जीवन की आध्यात्मिक उन्नति; परम्—चरम; योगम्—योग; तेन—उससे; एव—निश्चय ही; पुरुषम्—परम पुरुष; अभजत्—पूजा की; पुरुष-ऋषभ:—मनुष्यों में श्रेष्ठ ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार मनुष्यों में श्रेष्ठ महाराज पृथु ने आध्यात्मिक उन्नति के उस पथ का अनुसरण किया जिसका उपदेश सनत्कुमार ने किया था; अर्थात् उन्होंने भगवान् कृष्ण की पूजा की।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में स्पष्ट कहा गया है कि संत सनत्कुमार के उपदेशानुसार महाराज पृथु प्राणायाम योग करते हुए भगवान् की सेवा में लगे रहे। इस श्लोक में पुरुषमभजत्पुरुषर्षभ: शब्द महत्त्वपूर्ण है। पुरुषर्षभ: महाराज पृथु के लिए आया है, जो मनुष्यों में श्रेष्ठ थे और पुरुषम् भगवान् के लिए आया है। निष्कर्ष यह निकलता है कि जो पुरुषों में श्रेष्ठ होता है, वह परम पुरुष की सेवा करता है। एक पुरुष शब्द पूजनीय के लिए तथा दूसरा पुरुष शब्द पूजक के लिए है। जब पूजा करने वाला पुरुष अर्थात् जीवात्मा अपने को परम पुरुष से एकाकार मानता है, तो वह मोहित होकर अविद्या के अंधकार में गिर जाता है। जैसाकि भगवान् कृष्ण ने भगवद्गीता (२.१२) में कहा है—युद्धक्षेत्र में एकत्र सभी प्राणी तथा कृष्ण भी स्वयं भूतकाल में भी व्यक्तियों के रूप में थे और भविष्य में भी रहेंगे। फलत: दोनों पुरुष—जीवात्मा तथा परमात्मा—कभी भी अपनी सत्ता नहीं खोते। वास्तव में जो स्वरूपसिद्ध है, वह इस जन्म में तथा अगले जन्मों में भी भगवान् की सेवा में लगा रहता है। भक्तों के लिए वास्तव में इस जीवन तथा अगले जीवन में कोई अन्तर नहीं रहता। इस जीवन में नवदीक्षित भक्त को भगवान् की सेवा करने का प्रशिक्षण दिया जाता है और अगले जीवन में वह वैकुण्ठ में भगवान् के निकट पहुँच जाता है और वैसी ही सेवा करता रहता है। नवदीक्षित भक्त के लिए भी भक्ति ब्रह्मभूयाय कल्पते मानी जाती है। भगवद्भक्ति को कभी भी भौतिक कर्म नहीं माना जाता। ब्रह्मभूत पद से कर्म करने के कारण भक्त पहले ही मुक्त हो जाता है। अत: उसे ब्रह्मभूत अवस्था तक पहुँचने के लिए किसी अन्य प्रकार के योग-साधन की आवश्यकता नहीं रहती। यदि भक्त गुरु के आदेशों पर अटल रहता है, विधि-विधानों का पालन करता है और हरे-कृष्ण-मंत्र का जप करता है, तो यह समझना चाहिए कि उसने ब्रह्मभूत अवस्था पहले ही प्राप्त कर ली है, जैसाकि भगवद्गीता (१४.२६) में पुष्टि की गई है—
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।

स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥

“जो पूर्ण भक्ति में रत और सभी परिस्थितियों में अचूक बना रहता है, वह प्रकृति के गुणों को तुरन्त पार कर लेता है और ब्रह्म के पद को प्राप्त होता है।”

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥