श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 1

 
श्लोक
मैत्रेय उवाच
विजिताश्वोऽधिराजासीत्पृथुपुत्र: पृथुश्रवा: ।
यवीयोभ्योऽददात्काष्ठा भ्रातृभ्यो भ्रातृवत्सल: ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
मैत्रेय: उवाच—मैत्रेय ने कहा; विजिताश्व:—विजिताश्व नाम का; अधिराजा—सम्राट; आसीत्—हुआ; पृथु-पुत्र:—महाराज पृथु का पुत्र; पृथु-श्रवा:—महान् कार्यों का; यवीयोभ्य:—छोटे भाइयों को; अददात्—दे दिया; काष्ठा:—विभिन्न दिशाएँ; भ्रातृभ्य:—भाइयों को; भ्रातृ-वत्सल:—भाइयों के प्रति अत्यन्त स्नेहिल ।.
 
अनुवाद
 
 मैत्रेय ऋषि ने आगे कहा : महाराज पृथु का सबसे बड़ा पुत्र विजिताश्व, जिसकी ख्याति अपने पिता की ही तरह थी, राजा बना और उसने अपने छोटे भाइयों को पृथ्वी की विभिन्न दिशाओं पर राज्य करने का अधिकार सौंप दिया, क्योंकि वह अपने भाइयों को अत्यधिक चाहता था।
 
तात्पर्य
 पिछले अध्याय में महाराज पृथु के जीवन तथा चरित्र का वर्णन कर चुकने के बाद मैत्रेय मुनि ने पृथु की वंश परम्परा में पुत्रों तथा पौत्रों का वर्णन प्रारम्भ किया। महाराज पृथु की मृत्यु के बाद उनका सबसे बड़ा पुत्र विजिताश्व इस पृथ्वी का राजा हुआ। वह अपने छोटे भाइयों के प्रति अत्यन्त स्नेह रखता था, अत: वह चाहता था कि वे संसार की विभिन्न दिशाओं
पर शासन करें। अनादि काल से नियम है कि राजा की मृत्यु के पश्चात् उसका सबसे बड़ा पुत्र सामान्यत: राजा बनता है। जब पृथ्वी पर पाण्डवों का राज्य था तब राजा पाण्डु के ज्येष्ठ पुत्र महाराज युधिष्ठिर ही सम्राट बने थे और उनके छोटे भाई उनकी सहायता करते थे। इसी प्रकार राजा विजिताश्व के छोटे भाई विश्व की विभिन्न दिशाओं के अधीक्षक नियुक्त हुए।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥