श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 10

 
श्लोक
यस्येदं देवयजनमनुयज्ञं वितन्वत: ।
प्राचीनाग्रै: कुशैरासीदास्तृतं वसुधातलम् ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
यस्य—जिसका; इदम्—यह; देव-यजनम्—यज्ञों द्वारा देवों को तुष्ट करना; अनुयज्ञम्—निरन्तर यज्ञ करते रहना; वितन्वत:— करते हुए; प्राचीन-अग्रै:—पूर्व दिशा की ओर रखते हुए; कुशै:—कुशों से; आसीत्—हो गई; आस्तृतम्—बिखरे हुए; वसुधा तलम्—पृथ्वी के ऊपर ।.
 
अनुवाद
 
 महाराज बर्हिषत् ने संसार भर में अनेक यज्ञ किये। उन्होंने कुश घासों को बिखेर कर उनके अग्रभागों को पूर्व की ओर रखा।
 
तात्पर्य
 जैसाकि पिछले श्लोक में कहा गया है, महाराज बर्हिषत् यज्ञों के कर्मकाण्ड में गहनभाव से लीन रहते थे (क्रिया-काण्डेषु निष्णात: )। इसका अर्थ यह हुआ कि ज्योंही एक स्थान पर यज्ञ समाप्त होता था, उसी के निकट दूसरे स्थान पर वह दूसरा यज्ञ प्रारम्भ कर देता था। आज के समय में भी सारे संसार में संकीर्तन यज्ञ सम्पन्न किये जाने की ऐसी ही आवश्यकता है। कृष्णभावनामृत- आन्दोलन ने विभिन्न स्थानों पर संकीर्तन यज्ञ सम्पन्न करना प्रारम्भ कर दिया है और यह देखा गया है कि जहाँ भी ऐसा यज्ञ किया जाता है, वहाँ हजारों लोग एकत्र होते हैं और उसमें भाग लेते हैं। इस प्रकार से प्राप्त अदृश्य कल्याण को सारे संसार भर में चालू करना चाहिए। कृष्णभावनामृत-आन्दोलन के सदस्यों को एक के पश्चात्
एक इतने संकीर्तन यज्ञ करने चाहिए कि लोग, हँसी-हँसी में ही सही या फिर गभ्भीरतापूर्वक हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे, हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे- महामंत्र का जाप करें। इससे उनके हृदय विमल होंगे। भगवान् का पवित्र नाम (हरेर्नाम ) इतना शक्तिशाली होता है कि चाहे हँसी में जपा जाये या गम्भीरतापूर्वक, इस मंत्र की ध्वनि चारों ओर समान रूप से फैलती है। इस समय महाराज बर्हिषत् की भाँति बारम्बार यज्ञ करना सम्भव नहीं है, किन्तु संकीर्तन यज्ञ करना तो हमारे वश में है, क्योंकि इसमें कुछ भी धन लगता नहीं। कोई कहीं भी बैठकर हरे-कृष्ण-महामंत्र का जप कर सकता है। यदि पृथ्वी तल को हरे कृष्ण मंत्र के जप से आप्लावित कर दिया जाये तो संसार के लोग परम सुखी हो जाँय।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥