श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 11

 
श्लोक
सामुद्रीं देवदेवोक्तामुपयेमे शतद्रुतिम् ।
यां वीक्ष्य चारुसर्वाङ्गीं किशोरीं सुष्ठ्वलङ्कृताम् ।
परिक्रमन्तीमुद्वाहे चकमेऽग्नि: शुकीमिव ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
सामुद्रीम्—समुद्र की कन्या को; देव-देव-उक्ताम्—परम देवता ब्रह्मा के कहने से; उपयेमे—विवाह किया; शतद्रुतिम्—शतद्रुति नामक; याम्—जिसको; वीक्ष्य—देखकर; चारु—अत्यन्त आकर्षक; सर्व-अङ्गीम्—शरीर के सभी अंग; किशोरीम्—युवती; सुष्ठु—अत्यधिक; अलङ्कृताम्—आभूषणों से सजी; परिक्रमन्तीम्—परिक्रमा करती, घूमती; उद्वाहे—विवाह में; चकमे— आकर्षित होकर; अग्नि:—अग्निदेव ने; शुकीम्—शुकी को; इव—सदृश ।.
 
अनुवाद
 
 महाराज बर्हिषत् (आगे प्राचीनबर्हि नाम से विख्यात) को परम देवता ब्रह्माजी ने समुद्र की कन्या शतद्रुति के साथ विवाह करने का आदेश दिया था। उसके शरीर के अंग-प्रत्यंग अत्यन्त सुन्दर थे और वह अत्यन्त युवा थी। वह समुचित परिधानों से अलंकृत थी। जब वह विवाह- मण्डप में आकर प्रदक्षिणा करने लगी तो अग्निदेव उस पर इतने मोहित हो गये कि उन्होंने उसे संगी बना कर उसके साथ भोग करना चाहा जिस तरह पहले भी उन्होंने शुकी के साथ करना चाहा था।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में सुष्ठ्वलङ्कृतम् शब्द महत्त्वपूर्ण है। जब कन्या का विवाह वैदिक रीति से होता है, तो उसे मूल्यवानवस्त्रों तथा आभूषणों से अत्यधिक अलकृंत किया जाता है और विवाह के समय वधू वर की सात प्रदक्षिणाएँ करती है। तत्पश्चात् वर वधू एक दूसरे को देखते हैं और जीवन भर के लिए आकर्षित हो जाते हैं। जब वर बधू को अतीव सुन्दरी पाता है, तो उनके मध्य अति प्रबल आकर्षण स्थिर हो जाता है। जैसाकि श्रीमद्भागवत में कथित है, स्त्री तथा पुरुष स्वभाव से एक दूसरे के प्रति आकृष्ट होते हैं और जब वे विवाह से बँध जाते हैं, तो यह आकर्षण और भी सुदृढ़ हो जाता है। इस प्रकार अत्यधिक आकृष्ट होकर वर (दूल्हा) बढिय़ा घर और अन्न उत्पन्न करने के लिए अच्छा खेत बनाना चाहता है। तब सन्तान उत्पन्न होती है, मित्र बनते हैं तथा सम्पत्ति आती है। इस प्रकार मनुष्य जीवन की भौतिकता में अधिकाधिक फँसता जाता है और सोचने लगता है, “यह मेरा है,” “मैं ही काम करने वाला हूँ।” इस तरह संसार का मोह बढ़ता जाता है।
शुकीम् इव शब्द भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि जब शतद्रुति प्राचीनबर्हि की प्रदक्षिणा कर रही थी अग्नीदेव उसकी सुन्दरता पर उसी तरह मोहित हो गये जिस प्रकार वे पहले सप्तर्षि की पत्नी शुकी पर मोहित हो चुके थे। जब बहुत काल पूर्व सप्तर्षि-सभा में अग्निदेव उपस्थित थे तो वे शुकी पर जब वह प्रदक्षिणा कर रही थी इसी प्रकार मोहित हुए थे। तब अग्नि की पत्नी स्वाहा ने शुकी का रूप धारण कर अग्नि के साथ संभोग किया था। न केवल अग्नि, अपितु स्वर्ग के राजा इन्द्र तथा कभी- कभी ब्रह्मा तथा शिव जैसे बड़े-बड़े देवता भी काममोहित होते रहे हैं। जीवात्माओं में काम-भावना इतनी प्रबल होती है कि सारा भौतिक संसार विषय-आकर्षण के द्वारा ही संचालित हो रहा है और काम-वासना के कारण ही मनुष्य भौतिक संसार में रहने तथा विभिन्न प्रकार के शरीर धारण करने के लिए बाध्य होता है। अगले श्लोक में विषयी जीवन के प्रति आकर्षण का चित्रण हुआ है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥