श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 12

 
श्लोक
विबुधासुरगन्धर्वमुनिसिद्धनरोरगा: ।
विजिता: सूर्यया दिक्षु क्‍वणयन्त्यैव नूपुरै: ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
विबुध—विद्वान; असुर—असुर; गन्धर्व—गन्धर्व लोक के वासी; मुनि—बड़े-बड़े साधु; सिद्ध—सिद्ध लोक के वासी; नर— पृथ्वी लोक के वासी; उरगा:—नाग लोक के वासी; विजिता:—मोहित; सूर्यया—नवेली द्वारा; दिक्षु—समस्त दिशाओं में; क्वणयन्त्या—झंकार करती हुई; एव—केवल; नूपुरै:—अपने नुपूरों से ।.
 
अनुवाद
 
 जब शतद्रुति का इस तरह विवाह हो रहा था, तो असुर, गन्धर्वलोक के वासी, बड़े-बड़े साधु एवं सिद्धलोक, पृथ्वीलोक तथा नागलोक के वासी, सभी परम विद्वान् होते हुए भी उसके नुपूरों की झनकार से मोहित हो रहे थे।
 
तात्पर्य
 सामान्य रूप से कम आयु में विवाह हो जाने पर एक सन्तान को जन्म देने के पश्चात् स्त्री अधिक सुन्दर हो जाती है। सन्तान को जन्म देना नारी का प्राकृतिक कार्य है। इस प्रकार एक के बाद एक सन्तान उत्पन्न करके वह अधिकाधिक सुन्दर होती जाती है। किन्तु शतद्रुति इतनी सुन्दर थी कि उसने अपने विवाहोत्सव में ही सारे संसार को मोह लिया। दरअसल, उसने अपने नुपूरों की झनकार से ही बड़े-बड़े विद्वानों तथा महान् देवताओं को आकृष्ट कर लिया। इससे सूचित होता है कि सभी देवता उसका सौंदर्य देखना चाह रहे थे, किन्तु वस्त्राभूषणों से ढकी होने के कारण वे उसे ठीक से देख नहीं पा रहे थे। चूँकि वे उसके पाँव ही देख रहे थे, अत: नुपूरों की झनकार सुनकर ही वे मोहित हो रहे थे। उन्हें उसका पूरा सौंदर्य देखने की आवश्यकता न थी।
कभी-कभी मनुष्य स्त्रियों की चूडिय़ों की खनक, नुपूरों की झनकार अथवा साड़ी देखकर ही काममोहित हो उठता है। इस प्रकार यह निष्कर्ष निकला कि स्त्री माया का पूर्ण रूप है। यद्यपि विश्वामित्र मुनि आँखें बन्द किये योगाभ्यास में लीन थे, किन्तु जब उन्होंने मेनका की चूडिय़ों की खनक सुनी तो उनका दिव्य ध्यान टूट गया। इस प्रकार विश्वामित्र मेनका के चंगुल में आ गये और उससे एक सन्तान उत्पन्न हुई जो शकुन्तला नाम से जगत्प्रसिद्ध हुई। निष्कर्ष यह है कि कोई भी अपने को नारी-आकर्षण से नहीं बचा सकता, भले ही वह महान् देवता अथवा उच्चलोक का वासी क्यों न हो। केवल भगवद्भक्त, जो कृष्ण पर आसक्त है, स्त्री के आकर्षण से बच पाता है। एक बार कृष्ण द्वारा आकृष्ट होने पर संसार की माया उसे आकर्षित नहीं कर सकती।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥