श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 14

 
श्लोक
पित्रादिष्टा: प्रजासर्गे तपसेऽर्णवमाविशन् ।
दशवर्षसहस्राणि तपसार्चंस्तपस्पतिम् ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
पित्रा—पिता द्वारा; आदिष्टा:—आदेश पाकर; प्रजा-सर्गे—सन्तान उत्पन्न करने के विषय में; तपसे—तपस्या करने में; अर्णवम्—समुद्र में; आविशन्—प्रविष्ट होकर; दश-वर्ष—दस साल; सहस्राणि—हजारों; तपसा—अपनी तपस्या से; आर्चन्—पूजा की; तप:—तपस्या के; पतिम्—स्वामी की ।.
 
अनुवाद
 
 जब इन सभी प्रचेताओं को उनके पिता ने विवाह करके सन्तान उत्पन्न करने का आदेश दिया तो सबों ने समुद्र में प्रवेश किया और दस हजार वर्षों तक तपस्या की। इस प्रकार उन्होंने समस्त तपस्या के स्वामी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की उपासना की।
 
तात्पर्य
 कभी-कभी ऋषि तथा साधु संसार के शोरगुल से दूर एकान्तवास करने के लिए हिमालय पर्वत में जाते हैं। किन्तु ऐसा लगता है कि एकान्तवास में तपस्या करने के लिए प्राचीनबर्हि के सभी पुत्रों ने समुद्र के भीतर प्रवेश किया। चूँकि वे दस हजार वर्षों तक तपस्या करते रहे, अत: यह घटना सत्ययुग की है, क्योंकि तब लोग एक लाख वर्ष तक जीवित रहते थे। यह भी महत्त्वपूर्ण बात है कि तपस्या करते हुए उन्होंने तपेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण की उपासना की। यदि चरम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कोई तपस्या करना चाहता है, तो उसे भगवान् की कृपा प्राप्त करनी चाहिए। यदि उसे भगवत्कृपा प्राप्त हो गई तो समझिये कि उसने सारी तपस्याएँ समाप्त करके उनमें दक्षता प्राप्त कर ली है। दूसरी ओर, यदि उसे भक्ति की पूर्ण अवस्था प्राप्त नहीं हो पाती तो उसकी सारी तपस्याएं व्यर्थ हैं, क्योंकि तपस्या करने से प्राप्त होने वाले सर्वोच्च फल को परमेश्वर के बगैर कोई ग्रहण नहीं कर सकता। जैसाकि भगवद्गीता (५.२९) में कहा गया है, भगवान् श्रीकृष्ण समस्त तपस्याओं तथा यज्ञों के स्वामी हैं। भोक्तारं यज्ञ तपसां सर्वलोक महेश्वरम्। इस प्रकार तपस्या का वांछित फल भगवान् श्रीकृष्ण से ही प्राप्त हो सकता है।
श्रीमद्भागवत (३.३३.७) में कहा गया है—

अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान् यज्जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम्।

तेपुस्तपस्ते जुहुवु: सस्नुरार्या ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते ॥

भले ही कोई चाण्डाल कुल में अर्थात् मानव समाज का सबसे निचले वर्ग में क्यों न जन्मा हो, यदि वह भगवान् के नाम का जप करता है, तो वह धन्य है, क्योंकि यह समझा जाता है कि ऐसे जप से भक्त यह सिद्ध कर देता है कि पिछले जन्म में उसने सभी प्रकार की तपस्याएँ की थीं। भगवान् चैतन्य की कृपा से जो कोई महामंत्र (हरे कष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे। हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे।) का जप करता है, वह उस परम सिद्धि को प्राप्त करता है, जिसे पहले के लोग समुद्र में प्रवेश करके दस हजार वर्षों तक तपस्या करके प्राप्त करते थे। यदि इस कलियुग में कोई हरे कृष्ण मंत्र जप करने का लाभ नहीं उठाता, जो इस युग की पतितात्माओं के लिए सबसे बड़ी छूट है, तो यह समझना चाहिए कि वह भगवान् की माया से मोहग्रस्त है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥