श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 16

 
श्लोक
विदुर उवाच
प्रचेतसां गिरित्रेण यथासीत्पथि सङ्गम: ।
यदुताह हर: प्रीतस्तन्नो ब्रह्मन् वदार्थवत् ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
विदुर: उवाच—विदुर ने पूछा; प्रचेतसाम्—समस्त प्रचेताओं की; गिरित्रेण—शिवजी द्वारा; यथा—जिस प्रकार; आसीत्—था; पथि—रास्ते में; सङ्गम:—भेंट; यत्—जो; उत आह—कहा; हर:—शिवजी ने; प्रीत:—प्रसन्न होकर; तत्—वह; न:—हमको; ब्रह्मन्—हे ब्राह्मण; वद—कहो; अर्थ-वत्—अर्थ समझा कर ।.
 
अनुवाद
 
 विदुर ने मैत्रेय से पूछा: हे ब्राह्मण, प्रचेतागण रास्ते में शिवजी से क्यों मिले? कृपया मुझे बताएँ कि उनसे किस प्रकार भेंट हुई, भगवान् शिव उनसे किस प्रकार इतने प्रसन्न हो गये और उन्होंने क्या उपदेश दिया? निस्सन्देह, ऐसी बातें महत्वपूर्ण हैं और मैं चाहता हूँ कि आप कृपा करके मुझसे इनका वर्णन करें।
 
तात्पर्य
 जब भी भक्त तथा भगवान् के बीच या उच्च भक्तों में परस्पर महत्त्वपूर्ण वार्ताएँ हों तो मनुष्य को उन्हें उत्सुकता से सुनना चाहिए। नैमिषारण्य की सभा में जहाँ सभी ऋषियों को सूत गोस्वामी श्रीमद्भागवत सुना रहे थे, उनसे भी महाराज परीक्षित तथा शुकदेव गोस्वामी की वार्ताओं के विषय में पूछा गया, क्योंकि
ऋषियों को विश्वास था कि उनकी वार्ताएँ भी भगवान् कृष्ण तथा अर्जुन के मध्य हुई वार्ताओं के समान महत्त्वपूर्ण रही होंगी। जिस तरह प्रत्येक व्यक्ति भगवद्गीता से पूर्णतया अवगत होना चाहता है, उसी प्रकार विदुर भी शिव तथा प्रचेताओं के बीच हुई वार्ता के विषय में ऋषि मैत्रेय से जानने के लिए उत्सुक थे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥