श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 17

 
श्लोक
सङ्गम: खलु विप्रर्षे शिवेनेह शरीरिणाम् ।
दुर्लभो मुनयो दध्युरसङ्गाद्यमभीप्सितम् ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
सङ्गम:—संग, समागम; खलु—निश्चय ही; विप्र-ऋषे—हे ब्राह्मण श्रेष्ठ; शिवेन—शिव के साथ; इह—इस संसार में; शरीरिणाम्—भौतिक देहों में बँधे हुओं का; दुर्लभ:—कठिन; मुनय:—मुनिगण; दध्यु:—ध्यान में लगे हुए; असङ्गात्—प्रत्येक वस्तु से विरक्त; यम्—जिसको; अभीप्सितम्—इच्छा करते हुए ।.
 
अनुवाद
 
 विदुर ने आगे कहा : हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, देहधारियों के लिए शिवजी के साथ साक्षात् सम्पर्क कर पाना अत्यन्त कठिन है। बड़े-बड़े ऋषि भी जिन्हें भौतिक आसक्ति से कोई लेनदेन नहीं होता, उनका समागम पाने के लिए ही, ध्यान में लीन रहने के बावजूद भी उनका संसर्ग प्राप्त नहीं कर पाते।
 
तात्पर्य
 चूँकि बिना विशेष कारण के शिवजी अवतरित नहीं होते, अत: सामान्य व्यक्ति का उनसे सम्पर्क कर पाना कठिन है। किन्तु जब भगवान् का आदेश होता है, तो उन्हें किसी विशेष अवसर पर अवतार लेना होता है। इस प्रसंग में पद्म पुराण में कहा गया है कि कलियुग में मायावाद दर्शन का उपदेश देने के लिए शिवजी ब्राह्मण के रूप में प्रकट हुए थे। यह दर्शन बौद्ध दर्शन के एक प्रकार के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है। पद्म पुराण का कथन है—
मायावादमसच्छास्त्रं प्रच्छन्नं बौद्धमुच्यते।

मयैव विहितं देवी कलौ ब्राह्मणमूर्तिना ॥

शिवजी ने पार्वती से पहले ही बता दिया था कि वे बौद्ध दर्शन के उन्मूलन हेतु संन्यासी ब्राह्मण के वेश में मायावाद दर्शन का विस्तार करेंगे। यह संन्यासी और कोई नहीं बल्कि श्रीपाद शंकराचार्य थे। बौद्ध दर्शन के प्रभावों पर विजय पाने तथा वेदान्त दर्शन का प्रसार करने के लिए श्रीपाद शंकराचार्य को बौद्ध दर्शन के साथ कुछ समझौता करना पड़ा और उस समय की आवश्यकता के अनुसार उन्होंने केवल अद्वैतवाद का उपदेश दिया, अन्यथा उन्हें मायावाद दर्शन के उपदेश देने की कोई आवश्यकता नहीं थी। इस समय मायावाद दर्शन या बौद्ध दर्शन के उपदेश की कोई आवश्यकता नहीं है। भगवान् चैतन्य ने इन दोनों का बहिष्कार किया। कृष्णभावनामृत-आन्दोलन भगवान् चैतन्य के दर्शन का प्रसार और दोनों प्रकार के मायावादी दर्शनों का बहिष्कार कर रहा है। एक प्रकार से बौद्ध दर्शन तथा शंकर दर्शन सांसारिक स्तर पर मायावाद के विभिन्न रूप हैं। इनमें से किसी का भी आध्यात्मिक महत्त्व नहीं है। आध्यात्मिक महत्त्व तो भगवद्गीता के दर्शन को स्वीकार करने के पश्चात् है, जो भगवान् की शरण ग्रहण करने में फलीभूत होता है। सामान्यत: लोग किसी लाभ के लिए शिवजी की पूजा करते हैं और उनका साक्षात् दर्शन किए बिना भी वे उनकी उपासना करके बड़े-बड़े भौतिक लाभ प्राप्त करते हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥