श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 18

 
श्लोक
आत्मारामोऽपि यस्त्वस्य लोककल्पस्य राधसे ।
शक्त्या युक्तो विचरति घोरया भगवान् भव: ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
आत्म-आराम:—आत्मतुष्ट; अपि—यद्यपि वह है; य:—जो है; तु—लेकिन; अस्य—इस; लोक—भौतिक जगत; कल्पस्य— प्रकट होने पर; राधसे—इस संसार की सहायता के लिए; शक्त्या—शक्ति से; युक्त:—साथ; विचरति—कार्य करता है; घोरया—अत्यन्त भयानक; भगवान्—भगवान्; भव:—शिव ।.
 
अनुवाद
 
 शिवजी जो अत्यन्त शक्तिशाली देवता हैं और वे आत्माराम हैं, जिनका नाम भगवान् विष्णु के ही बाद आता है। यद्यपि उन्हें इस भौतिक जगत में किसी वस्तु की कोई आकांक्षा नहीं है, किन्तु वे संसारी लोगों के कल्याण कार्य में सदैव व्यस्त रहते हैं और अपनी घोर शक्तियों—यथा देवी काली तथा देवी दुर्गा—के साथ रहते हैं।
 
तात्पर्य
 शिवजी भगवान् के सबसे बड़े भक्त माने जाते हैं। वे सभी प्रकार के वैष्णवों में श्रेष्ठ माने जाते हैं (वैष्णवानां यथा शम्भु: )। फलत: शिवजी का एक वैष्णव सम्प्रदाय है, जिसे रुद्र सम्प्रदाय कहते हैं। जिस प्रकार ब्रह्माजी से ब्रह्म सम्प्रदाय चलता है उसी प्रकार शिवजी से रुद्र सम्प्रदाय। जैसाकि श्रीमद्भागवत (६.३.२०) में कहा गया है शिवजी बारह महाजनों में से एक हैं—
स्वयम्भूर्नारद: शम्भु: कुमार: कपिलो मनु:।

प्रह्लादो जनको भीष्मो बलिर्वैयासकिर्वयम् ॥

ईश्वर की भक्ति का उपदेश करने वाले बारह महाजन हैं। शम्भु का अर्थ है शिवजी। उनकी शिष्य परम्परा विष्णुस्वामी सम्प्रदाय नाम से भी ज्ञात है और वर्तमान विष्णुस्वामी सम्प्रदाय को वल्लभ सम्प्रदाय भी कहते हैं। वर्तमान ब्रह्म-सम्प्रदाय मध्व-गौड़ीय सम्प्रदाय कहलाता है। यद्यपि शिवजी मायावाद दर्शन का उपदेश करते प्रतीत होते थे, किन्तु शंकराचार्य के रूप में अपनी लीलाओं के अन्त में उन्होंने वैष्णव दर्शन—भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते—का उपदेश दिया। उन्होंने भगवान् कृष्ण या गोविन्द की पूजा के विषय में इस श्लोक में तीन बार बल दिया है और उन्होंने अपने शिष्यों को आगाह किया है कि वे मात्र शब्दजाल तथा व्याकरणिक गुत्थियों के द्वारा मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकते। यदि कोई सचमुच मुक्ति चाहता है, तो उसे भगवान् कृष्ण की पूजा करनी चाहिए। यही श्रीपाद शंकराचार्य का अन्तिम उपदेश है।

यहाँ पर यह उल्लेख हुआ है कि शिवजी सदैव अपनी भौतिक शक्ति के साथ रहते हैं (शक्त्या घोरया )। भौतिक शक्ति—देवी दुर्गा या देवी काली—सदैव उनके वश में रहती हैं। देवी काली तथा दुर्गा समस्त असुरों को मारकर उनकी सेवा करती हैं। कभी-कभी देवी काली इतनी क्रुद्ध हो उठती हैं कि बिना विचारे सारे असुरों का वध कर देती हैं। देवी काली के सर्वाधिक प्रचलित चित्र में उन्हें असुरों के मुंडों की माला पहने और बाएँ हाथ से एक सिर को पकड़े तथा दाएँ में एक विशाल खड्ग लिए दिखाया जाता है। महान् युद्ध काली द्वारा असुरों के विनाश के प्रतीक स्वरूप हैं और वास्तव में देवी काली द्वारा किए जाते हैं।

सृष्टिस्थितिप्रलयसाधनशक्तिरेका (ब्रह्म-संहिता ५.४४) असुर लोग भौतिक वैभव से पूजा द्वारा देवी काली या दुर्गा को प्रसन्न रखना चाहते हैं, किन्तु जब असुर अत्यधिक असह्य हो उठते हैं, तो देवी काली उनका बड़े पैमाने पर वध करने मे हिचकती नहीं हैं। असुरगण शिवजी की शक्ति के रहस्य को नहीं जानते और वे भौतिक लाभ के लिए देवी काली या दुर्गा या शिवजी की पूजा करते हैं। अपने आसुरी आचरण के कारण वे भगवान् की शरण में नहीं जाते जैसाकि भगवद्गीता (७.१५) में संकेत मिलता है।

न मां दुष्कृतिनो मूढा: प्रपद्यन्ते नराधमा:।

माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिता: ॥

शिवजी का कार्य अत्यन्त कठिन है, क्योंकि उन्हें देवी काली (या दुर्गा) की शक्ति काम में लानी पड़ती है। एक अन्य प्रचलित चित्र में देवी काली को कभी-कभी शिवजी के शरीर पर खड़ा दिखलाया जाता है, जो यह बताता है कि कभी-कभी काली द्वारा असुरों का वध बन्द करवाने के लिए शिवजी को पृथ्वी पर दण्डवत् लेटना पड़ता है। चूँकि शिवजी महान् भौतिक शक्ति (देवी दुर्गा) को अपने वश में रखते हैं, अत: शिव के उपासक इस संसार में प्रचुर ऐश्वर्य युक्त पद प्राप्त करते हैं। शिवजी के आदेश से शिवभक्त सभी भौतिक सुविधाएँ प्राप्त करता है। इसके विपरीत विष्णु के उपासक वैष्णव भौतिक सम्पत्ति में शनै-शनै निर्धन होते जाते हैं, क्योंकि भगवान् विष्णु अपने भक्तों को सांसारिक ऐश्वर्य के बन्धन में नहीं पडऩे देना चाहते। वे तो अपने भक्तों को अन्त:करण से बुद्धि प्रदान करते हैं जैसाकि भगवद्गीता (१०.१०) में कहा गया है—

तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।

ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥

“जो निरन्तर मेरी भक्ति में रत रहते हैं और प्रेमपूर्वक मेरी पूजा करते हैं, उन्हें मैं बुद्धि प्रदान करता हूँ जिससे वे मेरे पास आ सकते हैं।”

इस प्रकार भगवान् विष्णु अपने भक्त को बुद्धि प्रदान करते हैं जिससे वह भगवान् के धाम को वापस जा सकता है। चूँकि भक्त को किसी प्रकार के भौतिक वैभव से कोई सरोकार नहीं रहता, अत: वह देवी काली या दुर्गा के अधीन नहीं रहता।

शिवजी इस संसार में तमोगुण के भी अधीक्षक हैं। उनकी शक्ति, देवी दुर्गा, समस्त जीवों को अविद्या के अंधकार में रखती हुई बतायी जाती है (या देवी सर्वभूतेषु निद्रा-रूपं संस्थिता )। ब्रह्मा तथा शिव दोनों ही भगवान् विष्णु के अवतार हैं, किन्तु ब्रह्मा को सृष्टि करने का भार सौंपा गया जब कि शिवजी को संहार का, जिसे वे अपनी भौतिक शक्ति देवी काली या देवी दुर्गा की सहायता से पूरा करते हैं। इस प्रकार इस श्लोक में शिवजी को ध्वंसक शक्तियों (शक्त्या-घोरया ) के साथ रहते बताया गया है और वस्तुस्थिति भी यही है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥