श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 19

 
श्लोक
मैत्रेय उवाच
प्रचेतस: पितुर्वाक्यं शिरसादाय साधव: ।
दिशं प्रतीचीं प्रययुस्तपस्याद‍ृतचेतस: ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
मैत्रेय: उवाच—ऋषि मैत्रेय ने कहा; प्रचेतस:—राजा प्राचीबर्हि के सारे पुत्र; पितु:—पिता के; वाक्यम्—शब्द को; शिरसा— मस्तक पर; आदाय—धारण करके; साधव:—सभी पवित्र; दिशम्—दिशा की ओर; प्रतीचीम्—पश्चिमी; प्रययु:—चले गये; तपसि—तपस्या में; आदृत—गम्भीरतापूर्वक स्वीकार करके; चेतस:—हृदय में ।.
 
अनुवाद
 
 ऋषि मैत्रेय ने आगे कहा : हे विदुर, अपनी साधु प्रकृति के कारण प्राचीनबर्हि के सभी पुत्रों ने अपने पिता के वचनों को शिरोधार्य किया और पिता की आज्ञा पूरी करने के उद्देश्य से वे पश्चिम दिशा की ओर चले गये।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में साधव: (पवित्र या सदाचारी) शब्द आज की परिस्थिति में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यह साधु शब्द से निकला है। पूर्ण साधु वह है, जो भगवान् की भक्ति में सदैव लगा रहता है। प्राचीनबर्हि के पुत्रों को साधव: कहा गया है, क्योंकि वे पिता के आज्ञाकारी थे। पिता, राजा तथा गुरु को भगवान् का प्रतिनिधि माना जाता है, अत: उनका भगवान् के ही समान आदर किया जाना चाहिए। पिता, गुरु तथा राजा
का धर्म है कि वे अपने अधीनस्थों को इस प्रकार नियंत्रित करें कि अन्तत: वे भगवान् के शुद्ध भक्त बन सकें। वह तो बड़ों का कर्तव्य है और अधीनस्थों का कर्तव्य यह है कि वे आदेशों का सही तथा अनुशासित ढंग से पालन करें। शिरसा (अपने मस्तक पर) शब्द भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि प्रचेताओं ने पिता के आदेश को मस्तक पर धारण कर लिया, जिसका अर्थ है कि उन्होंने उसे पूरी तरह स्वीकार कर लिया।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥