श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 20

 
श्लोक
ससमुद्रमुप विस्तीर्णमपश्यन् सुमहत्सर: ।
महन्मन इव स्वच्छं प्रसन्नसलिलाशयम् ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
स-समुद्रम्—समुद्र के निकट ही; उप—कुछ-कुछ; विस्तीर्णम्—अत्यन्त लम्बा चौड़ा; अपश्यन्—उन्होंने देखा; सु-महत्— अत्यन्त विशाल; सर:—जलाशय; महत्—महापुरुष; मन:—मन; इव—सदृश; सु-अच्छम्—स्वच्छ, निर्मल; प्रसन्न—प्रसन्न; सलिल—जल; आशयम्—शरण में आये हुए ।.
 
अनुवाद
 
 चलते-चलते प्रचेताओं ने एक विशाल जलाशय देखा जो समुद्र के समान ही विशाल दिखता था। इसका जल इतना शान्त था मानो किसी महापुरुष का मन हो और इसके जलचर इतने बड़े जलाशय की संरक्षण में होकर अत्यन्त शान्त तथा प्रसन्न प्रतीत हो रहे थे।
 
तात्पर्य
 स-समुद्र का अर्थ है समुद्र के निकट। वह जलाशय खाड़ी के समान था, क्योंकि समुद्र के निकट ही था। उप शब्द जिस का अर्थ है “न्यूनाधिक” कई प्रकार से प्रयुक्त होता है यथा उपपति से “कुछ-कुछ” पति अर्थात् पति के समान प्रेमी सूचित होता है। उप का अर्थ ‘बड़ा’ ‘छोटा’ या ‘पास’ भी होता है। इन सब बातों को देखते हुए, प्रचेताओं ने जो जलाशय देखा था, वह वास्तव में एक बड़ी खाड़ी या झील (सरोवर) था। किन्तु यह जलाशय समुद्र की तरह उद्दाम लहरों से युक्त न होकर अत्यन्त शान्त था। इसका जल इतना निर्मल था मानो किसी महापुरुष का मन हो। ज्ञानी, योगी, भक्त—ये सभी महापुरुष अथवा शुद्ध भक्त हैं जो महान् आत्माएं भी कहलाती हैं, किन्तु हैं अत्यन्त दुर्लभ। योगियों तथा ज्ञानियों में अनेक महापुरुष मिलते हैं, किन्तु ऐसा महापुरुष, जो भगवान् का शुद्ध भक्त हो और भगवान् के प्रति पूर्णत: समर्पित हो, विरला ही होता है—स महात्मा सुदुर्लभ: (भगवद्गीता ७.१९)। भक्त का मन सदैव शान्त एवं निष्काम होता है, क्योंकि वह सदैव अन्याभिलाषिता शून्यम् होता है, अर्थात् श्रीकृष्ण के अतिरिक्त और किसी की दास, मित्र, पिता, माता या प्रेमी के रूप में सेवा नहीं करना चाहता। कृष्ण की निरन्तर संगति के कारण भक्त सदैव अत्यन्त शान्त रहता है। यह भी महत्त्वपूर्ण बात है कि उस जलाशय के सारे प्राणी भी अत्यधिक शान्त थे। चूँकि भक्त के शिष्य महापुरुष की शरण में रहते हैं, वे परम शान्त हो जाते हैं और भवसागर की लहरों से विचलित नहीं होते।
इस भौतिक संसार को प्राय: अज्ञान-सागर कहा जाता है। ऐसे सागर की प्रत्येक वस्तु विचलित होती रहती है। भक्त का मन भी समुद्र या जलाशय के समान है, किन्तु उसमें उद्वेलन नहीं होता। जैसाकि भगवद्गीता (२.४१) में कहा गया है—व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन। जो भगवान् की सेवा में दृढ़ हैं, वे किसी तरह विचलित नहीं होते। भगवद्गीता (६.२२) में कहा गया है—

यस्मिन्स्थितो न दु:खेन गुरुणापि विचाल्यते। यदि जीवन में विफलताएँ भी आएँ तो भी भक्त विचलित नहीं होता। अत: जो भी महापुरुष या भक्त की शरण ग्रहण करता है, वह शान्त हो जाता है। चैतन्य चरितामृत (मध्य १९.१४९) में कहा गया है—कृष्ण भक्त—निष्काम, अतएव ‘शान्त’। कृष्ण का भक्त सदैव शान्त रहता है, क्योंकि वह निष्काम होता है, किन्तु योगी, कर्मी तथा ज्ञानी अनेक इच्छाओं से पूर्ण होते हैं। कोई यह तर्क कर सकता है कि भक्त भगवान् के धाम जाना चाहते हैं, अत: वे भी इच्छाओं से पूर्ण होते हैं, किन्तु ऐसी इच्छाओं से उनके मन विक्षुब्ध नहीं होते। यद्यपि भक्त भगवान् के धाम जाना चाहता है, किन्तु वह जीवन की सभी परिस्थितियों में प्रसन्न रहता है। फलत: इस श्लोक में महन्-मन: शब्द यह आभास देने के लिए प्रयुक्त हुआ है कि जलायश का पानी उतना ही शान्त था जितना कि भक्त का मन।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥