श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 21

 
श्लोक
नीलरक्तोत्पलाम्भोजकह्लारेन्दीवराकरम् ।
हंससारसचक्राह्वकारण्डवनिकूजितम् ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
नील—नील; रक्त—लाल; उत्पल—कमल; अम्भ:-ज—जल से उत्पन्न; कह्लार—कमल की एक किस्म; इन्दीवर—कमल की एक किस्म; आकरम्—खान; हंस—हंस पक्षी; सारस—एक पक्षी; चक्राह्व—चकवा नाम का पक्षी; कारण्डव—पक्षी विशेष; निकूजितम्—चहक रहे थे ।.
 
अनुवाद
 
 उस विशाल सरोवर में विभिन्न प्रकार के कमल पुष्प थे। कुछ नीले थे तो कुछ लाल, कुछ रात्रि में खिलने वाले थे, तो कुछ दिन में और इन्दीवर जैसे कुछ कमल शाम को खिलने वाले थे। इन सब फूलों से सारा सरोवर पुष्पों की खान सा प्रतीत हो रहा था। फलस्वरूप सरोवर के तटों पर हंस, सारस, चक्रवाक, कारण्डव तथा अन्य सुन्दर जलपक्षी खड़े हुए थे।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में आकरम् (खान) शब्द महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि जलाशय ऐसी खान के सदृश लग रहा था, जिसमें विभिन्न प्रकार के कमल उत्पन्न होते हों। कुछ कमल तो दिन में खिलने वाले थे, कुछ रात्रि में और कुछ सायंकाल खिलने वाले थे, और तदनुसार उनके नाम तथा रंग भिन्न-भिन्न थे, ये सभी फूल सरोवर में विद्यमान थे और सरोवर शान्त था तथा कमल पुष्पों से पूरित था अत: हंस, चक्रवाक तथा कारण्डव जैसे पक्षी किनारों पर खड़े थे और विभिन्न प्रकार के गीत गा रहे थे, जिससे सारा दृश्य मनोरम लगता था। जिस प्रकार प्रकृति के तीन गुणों के मेल से भिन्न-भिन्न
प्रकार के मनुष्य होते हैं, उसी प्रकार पक्षी, वृक्ष, भौंरे भी भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं। भौतिक प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार ही सारी वस्तुएँ विभाजित हैं। हंस तथा सारस जैसे पक्षी, जो स्वच्छ जल तथा कमल पुष्पों का आनन्द उठाते हैं, गंदे स्थानों पर बैठने वाले कौवों से पृथक् हैं। इसी प्रकार मनुष्य हैं—वे रजोगुणी तथा तमोगुणी होते हैं और सतोगुणी भी। यह सृष्टि इतनी विचित्र है कि प्रत्येक समाज में भिन्नताएँ हैं। इस प्रकार कमल पुष्पों से पूरित उस विशाल सरोवर के तट पर सभी उत्तम पक्षी आनन्द ले रहे थे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥