श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 22

 
श्लोक
मत्तभ्रमरसौस्वर्यहृष्टरोमलताङ्‌घ्रिपम् ।
पद्मकोशरजो दिक्षु विक्षिपत्पवनोत्सवम् ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
मत्त—पागल; भ्रमर—भौंरे; सौ-स्वर्य—भिनभिनाहट के साथ; हृष्ट—प्रसन्नतापूर्वक; रोम—शरीर के बाल; लता—बेलें; अङ्घ्रिपम्—वृक्ष; पद्म—कमल; कोश—कोश, दलपुञ्ज; रज:—केशर; दिक्षु—सभी दिशाओं में; विक्षिपत्—बिखेरते हुए; पवन—वायु; उत्सवम्—उत्सव, पर्व ।.
 
अनुवाद
 
 उस सरोवर के चारों ओर तरह-तरह के वृक्ष तथा लताएँ थीं और उन पर मतवाले भौंरे गूँज रहे थे। भौंरों की मधुर गूँज से वृक्ष अत्यन्त उल्लसित लग रहे थे और कमल पुष्पों का केसर वायु में बिखर रहा था। इन सबसे ऐसा वातावरण उत्पन्न हो रहा था मानो कोई उत्सव हो रहा हो।
 
तात्पर्य
 वृक्ष तथा लताएँ भी विविध प्रकार के जीव हैं। जब भौंरें इन वृक्षों तथा लताओं से मधु संचय करने के लिए आते हैं, तो ये वृक्ष अत्यन्त प्रसन्न होते हैं। वायु भी ऐसे अवसर का लाभ उठाकर कमल पुष्पों के केशर को बिखेर
देती है। तिस पर हंसों का कलरव तथा शान्त जल। प्रचेतागण ऐसे वातावरण को एक अनवरत उत्सव मान बैठे। इस वर्णन से प्रतीत होता है कि प्रचेतागण शिवलोक पहुँच गये थे, जो हिमालय पर्वत में स्थित माना जाता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥