श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 23

 
श्लोक
तत्र गान्धर्वमाकर्ण्य दिव्यमार्गमनोहरम् ।
विसिस्म्यू राजपुत्रास्ते मृदङ्गपणवाद्यनु ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
तत्र—वहाँ; गान्धर्वम्—मधुर ध्वनि; आकर्ण्य—सुनकर; दिव्य—स्वर्गिक; मार्ग—समान रूप से; मन:-हरम्—सुन्दर; विसिस्म्यु:—वे चकित हो गये; राज-पुत्रा:—राजा बर्हिषत के पुत्र; ते—वे सब; मृदङ्ग—मृदंग, ढोल; पणव—ताशा, धौंसा; आदि—सब मिलकर; अनु—सदैव ।.
 
अनुवाद
 
 जब राजा के पुत्रों ने मृदंग तथा पणव के साथ-साथ अन्य राग-रागिनियों की कर्णप्रिय ध्वनि सुनी तो वे अत्यन्त विस्मित हुए।
 
तात्पर्य
 सरोवर के निकट विभिन्न फूल तथा जीव तो थे ही, इनके अतिरिक्त अनेक प्रकार की राग-रागिनियाँ सुनाई पड़ रही थीं। कहाँ यह दृश्य! कहाँ निर्विशेषवादियों का अनेकरूपता से हीन शून्यवाद! वास्तव में मनुष्य को सच्चिदानन्द की सिद्धि प्राप्त करनी होती है। चूँकि निर्विशेषवादी सृष्टि की इन विविध रूपों को स्वीकार नहीं करते, अत: वे दिव्य आनन्द का भोग
नहीं कर सकते। प्रचेतागण जिस स्थान पर पहुँचे थे वह शिव का धाम था। निर्विशेषवादी सामान्यत: शिव के उपासक होते हैं, किन्तु शिवजी कभी-भी अपने धाम में विविधता के बिना नहीं रहते। इस प्रकार मनुष्य चाहे जहाँ जाये, चाहे शिव, विष्णु या ब्रह्म लोक को जाये, ज्ञान तथा आनन्द से पूर्ण मनुष्यों को सर्वत्र अनेकरूपता (विचित्रता) दिखाई पड़ेगी।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥