श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 24-25

 
श्लोक
तर्ह्येव सरसस्तस्मान्निष्क्रामन्तं सहानुगम् ।
उपगीयमानममरप्रवरं विबुधानुगै: ॥ २४ ॥
तप्तहेमनिकायाभं शितिकण्ठं त्रिलोचनम् ।
प्रसादसुमुखं वीक्ष्य प्रणेमुर्जातकौतुका: ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
तर्हि—इतने में; एव—निश्चय ही; सरस:—जल से; तस्मात्—उसमें से; निष्क्रामन्तम्—निकलते हुए; सह-अनुगम्—महापुरुषों के साथ; उपगीयमानम्—अनुयायियों द्वारा वन्दित; अमर-प्रवरम्—देवताओं में प्रधान; विबुध-अनुगै:—अपने संगियों के साथ; तप्त-हेम—पिघला सोना; निकाय-आभम्—शारीरिक अंग; शिति-कण्ठम्—नीला कंठ; त्रि-लोचनम्—तीन नेत्र वाले; प्रसाद—दयालु; सु-मुखम्—सुन्दर चेहरा; वीक्ष्य—देखकर; प्रणेमु:—प्रणाम किया; जात—उत्पन्न हुआ; कौतुका:—कुतूहल ।.
 
अनुवाद
 
 प्रचेतागण भाग्यवान थे कि उन्होंने प्रमुख देव शिवजी को उनके पार्षदों सहित जल से बाहर आते देखा। उनकी शारीरिक कान्ति तपे हुए सोने के समान थी, उनका कंठ नीला था और उनके तीन नेत्र थे जिनसे वे भक्तों पर कृपादृष्टि डाल रहे थे। उनके साथ अनेक गन्धर्व गायक थे, जो उनका गुणगान कर रहे थे। ज्यों ही प्रेचताओं ने शिवजी को देखा उन्होंने तुरन्त ही कुतूहलवश उन्हें नमस्कार किया और वे उनके चरणों पर गिर पड़े।
 
तात्पर्य
 विबुधानुगै: शब्द बताता है कि शिवजी के साथ सदैव गन्धर्व तथा किन्नर जैसे स्वर्ग के वासी रहते हैं। ये सब संगीत में अत्यन्त पटु होते हैं और निरन्तर शिवजी की पूजा करते रहते हैं। चित्रों में शिवजी को सदैव श्वेत रंग का दिखाया जाता है, किन्तु यहाँ पर उनके शरीर का रंग श्वेत न होकर गलाये गये सोने या चमकीले पीले रंग का है। अत्यन्त दयालु होने के कारण शिवजी आशुतोष कहलाते हैं। देवताओं में से शिवजी को निम्नवर्ग के लोग भी प्रसन्न कर लेते हैं, उन्हें केवल बेलपत्र चढ़ाने तथा नमस्कार करने की आवश्यकता है। इस प्रकार उनका नाम आशुतोष है, जिसका अर्थ है कि वे तुरन्त ही प्रसन्न होने वाले हैं।
सामान्यत: जो लोग भौतिक सम्पन्नता चाहते हैं, वे ऐसे वरदान के लिए शिवजी के पास जाते हैं, उनके अत्यन्त दयालु होने के कारण भक्तों को मनवांछित फल देते हैं। असुरगण उनकी इस उदारता का लाभ उठाते हैं और कभी-कभी उनसे ऐसा वर प्राप्त कर लेते हैं, जो अन्यों के लिए अत्यन्त घातक होता है। उदाहरणार्थ, वृकासुर ने शिवजी से ऐसा वर प्राप्त किया था जिसकि वह जिस किसी का सिर को छू देता उसका अन्त हो जाता था। यद्यपि कभी-कभी शिवजी अपने भक्तों को ऐसे उदारतापूर्वक वर प्रदान करते हैं, किन्तु कठिनाई यह है कि कभी-कभी असुरगण कपटी होने के कारण ऐसे वरों का दुरुपयोग करना चाहते हैं। उदाहारणार्थ, वृकासुर ने वर प्राप्त करके शिवजी के सिर का स्पर्श करना चाहा। किन्तु विष्णु के भक्त कभी-भी ऐसे वर की इच्छा नहीं रखते, न ही विष्णु अपने भक्तों को ऐसा वर देते हैं जिससे संसार भर में अशान्ति फैले।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥