श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 26

 
श्लोक
स तान् प्रपन्नार्तिहरो भगवान्धर्मवत्सल: ।
धर्मज्ञान् शीलसम्पन्नान् प्रीत: प्रीतानुवाच ह ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
स:—शिवजी; तान्—उनको; प्रपन्न-आर्ति-हर:—सभी प्रकार के भयों को दूर करने वाला; भगवान्—ईश्वर; धर्म-वत्सल:— अत्यन्त धार्मिक; धर्म-ज्ञान्—धर्म से अवगत पुरुष; शील-सम्पन्नान्—अत्यन्त सदाचारी; प्रीत:—प्रसन्न होकर; प्रीतान्—अत्यन्त भद्र आचरण वाला; उवाच—उनसे बातें की; ह—भूतकाल में ।.
 
अनुवाद
 
 शिवजी प्रचेताओं से अत्यन्त प्रसन्न हुए, क्योंकि सामान्यत: शिवजी पवित्र तथा सदाचारी पुरुषों के रक्षक हैं। राजकुमारों से अत्यन्त प्रसन्न होकर वे इस प्रकार बोले।
 
तात्पर्य
 भगवान् विष्णु या कृष्ण भक्तवत्सल कहलाते हैं। यहाँ पर शिवजी को धर्मवत्सल कहा गया है। धर्मवत्सल उस व्यक्ति का द्योतक है, जो धार्मिक नियमों के अनुसार जीवन बिताता है। फिर भी इन दो शब्दों का अतिरिक्त महत्त्व है। कभी-कभी शिवजी का पाला ऐसे व्यक्तियों से पड़ता है, जो रजोगुणी तथा तमोगुणी होते हैं। ऐसे व्यक्ति सदैव ही धार्मिक नहीं होते और न उनके कार्य ही पवित्र होते हैं। चूँकि वे भौतिक लाभ से वशीभूत
होकर शिवजी की उपासना करते हैं, अत: कभी-कभी वे धार्मिक नियमों का पालन करते हैं। जब शिवजी देखते हैं कि उनके भक्त धर्मानुसार चलते हैं, तो वे उन्हें आशीर्वाद दे देते हैं। प्राचीनबर्हि के पुत्र प्रचेतागण स्वभाव से अत्यन्त पवित्र एवं भद्र थे, अत: शिवजी उन पर तुरन्त प्रसन्न हो गये। शिवजी समझ गये कि ये राजकुमार किसी वैष्णव के पुत्र हैं, अत: शिवजी ने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की इस प्रकार प्रार्थना की।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥