श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 27

 
श्लोक
श्रीरुद्र उवाच
यूयं वेदिषद: पुत्रा विदितं वश्चिकीर्षितम् ।
अनुग्रहाय भद्रं व एवं मे दर्शनं कृतम् ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-रुद्र: उवाच—शिवजी बोले; यूयम्—तुम सब; वेदिषद:—राजा प्राचीनबर्हि के; पुत्रा:—पुत्र; विदितम्—जानते हुए; व:— तुम्हारी; चिकीर्षितम्—इच्छाएँ; अनुग्रहाय—तुम पर अनुग्रह के लिए; भद्रम्—तुम्हारा कल्याण हो; व:—तुम सभी; एवम्—इस प्रकार; मे—मेरा; दर्शनम्—दर्शन; कृतम्—प्राप्त किया ।.
 
अनुवाद
 
 शिवजी ने कहा : तुम सभी प्राचीनबर्हि के पुत्र हो, तुम्हारा कल्याण हो। मैं जानता हूँ कि तुम क्या करने जा रहे हो, अत: मैंने तुम पर कृपा करने के लिए ही अपना दर्शन दिया है।
 
तात्पर्य
 इन शब्दों से शिव इंगित करते हैं कि जो कुछ राजकुमार करने वाले हैं, वह उन्हें पहले से ज्ञात है। वास्तव में वे कठिन तपस्या द्वारा भगवान् विष्णु की आराधना करने जा रहे थे। यह जानकर शिवजी तुरन्त ही अत्यधिक प्रसन्न हुए जैसाकि अगले श्लोक से विदित होगा। इससे सूचित होता है कि जो व्यक्ति भगवान् का भक्त नहीं है, किन्तु उनकी सेवा करना चाहता है उसे शिव जैसे प्रधान देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त होता है, अत: भगवद्भक्त को अलग से देवताओं को प्रसन्न नहीं करना पड़ता। मात्र परमेश्वर की आराधना द्वारा वह उन सबों को प्रसन्न कर सकता है। उसे देवताओं से भी किसी भौतिक आशीर्वाद की याचना नहीं करनी पड़ती है, क्योंकि
देवतागण प्रसन्न होकर स्वत: सब कुछ प्रदान करते हैं। देवता तो भगवान् के दास हैं, अत: वे सभी प्रकार से भक्तों की सहायता के लिए उद्यत रहते हैं। इसीलिए श्रील बिल्वमंगल ठाकुर ने कहा है कि यदि मनुष्य परमेश्वर की शुद्ध भक्ति करता है, तो भौतिक ऐश्वर्य प्रदान करने वाले देवों की बात तो दूर रही मुक्ति की देवी तक उसकी सेवा के लिए तैयार रहती हैं। दरअसल, सभी देवता भक्त की सेवा करने का अवसर पाने की प्रतीक्षा करते रहते हैं। अत: कृष्ण के भक्त को किसी ऐश्वर्य या मुक्ति के लिए प्रयास करने की कोई आवश्यकता नहीं रहती। वह भक्ति के दिव्य पद पर रह कर धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष के सारे लाभ प्राप्त करता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥