श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 28

 
श्लोक
य: परं रंहस:
साक्षात्‍त्रिरगुणाज्जीवसंज्ञितात् ।
भगवन्तं वासुदेवं प्रपन्न: स प्रियो हि
मे ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो कोई; परम्—दिव्य; रंहस:—नियामक का; साक्षात्—प्रत्यक्षत:; त्रि-गुणात्—प्रकृति के तीनों गुणों से; जीव संज्ञितात्—जीव कही जाने वाली जीवात्माओं से; भगवन्तम्—श्रीभगवान्; वासुदेवम्—श्रीकृष्ण का; प्रपन्न:—शरणागत; स:—वह; प्रिय:—अत्यन्त प्यारा; हि—निस्सन्देह; मे—मुझे ।.
 
अनुवाद
 
 शिवजी ने आगे कहा : जो व्यक्ति प्रकृति तथा जीवात्मा में से प्रत्येक के अधिष्ठाता भगवान् कृष्ण के शरणागत है, वह वास्तव में मुझे अत्यधिक प्रिय है।
 
तात्पर्य
 अब शिवजी कारण बताते हैं कि वे राजकुमारों के समक्ष साक्षात् क्यों आये। कारण यह था कि सभी राजकुमार भगवान् कृष्ण के भक्त थे। जैसाकि भगवद्गीता (७.१९) में कहा गया है— बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ: ॥

“अनेक जन्म-जन्मांतरों में जो ज्ञानी होता है, वह मुझे सब कारणों का कारण जान कर मेरी शरण ग्रहण करता है। ऐसा महापुरुष दुर्लभ होता है।”

सामान्य पुरुषों को शिवजी विरले ही दर्शन देते हैं। इसी प्रकार वासुदेव कृष्ण की शरण में जाने वाले व्यक्ति भी विरले ही हैं, क्योंकि पूर्णत: भगवान् की शरण में आये हुए लोग दुर्लभ हैं (स महात्मा सुदुर्लभ: )। फलत: शिवजी विशेष रूप से प्रचेताओं को देखने आये थे, क्योंकि वे सब भगवान् वासुदेव के पूर्णत: शरणागत थे। वासुदेव का उल्लेख भागवत के प्रारम्भिक मंत्र में भी हुआ है—ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। चूँकि वासुदेव चरम सत्य हैं, अत: शिवजी स्पष्ट कहते हैं कि जो भगवान् वासुदेव का भक्त है और श्रीकृष्ण का शरणागत है, वह मुझे अत्यन्त प्रिय है। भगवान् वासुदेव, कृष्ण न केवल सामान्य जनों द्वारा पूज्य हैं, वरन् शिव, ब्रह्मा तथा अन्य देवता भी उनकी पूजा करते हैं। यं ब्रह्मावरुणेन्द्ररुद्रमरुत: स्तुन्वन्ति दिव्यै: स्तवै: (भागवत १२.१३.१)—कृष्ण की पूजा ब्रह्मा, शिव, वरुण, इन्द्र, चन्द्र तथा अन्य सभी देवता करते हैं। यही हाल भक्तों का है। जो भी कृष्णभक्ति करता है, जो यह खोजने तथा समझने का प्रयास करता होता है कि कृष्णचेतना है क्या, वह तुरन्त उनका प्रिय बन जाता है। इसी प्रकार सभी देवता इसकी ताक में रहते हैं कि कौन सचमुच भगवान् वासुदेव की शरण में है। चूँकि प्रचेता राजकुमार वासुदेव के शरणागत थे, अत: शिवजी इच्छापूर्वक उनसे भेंट करने आये।

भगवद्गीता में भगवान् वासुदेव या श्रीकृष्ण को पुरुषोत्तम कहा गया है। वास्तव में वे भोक्ता (पुरुष) तथा परम (उत्तम) दोनों हैं। वे हर वस्तु—प्रकृति तथा पुरुष के भोक्ता हैं। प्रकृति के तीनों गुणों के प्रभाव से जीवात्मा प्रकृति पर अधिकार जताना चाहता है, किन्तु वह वास्तविक भोक्ता (पुरुष) न होकर प्रकृति है, जिसका वर्णन भगवद्गीता (७.५) में हुआ है—अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्। इस प्रकार जीव वास्तव में प्रकृति या परमेश्वर की तटस्था शक्ति है। भौतिक शक्ति (माया) के संग होने से वह प्रकृति पर अधिकार करना चाहता है। भगवद्गीता (१५.७) में इसकी पुष्टि हुई है—

ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:।

मन: षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥

“इस बद्ध संसार में जीवात्माएँ मेंरे शाश्वत अंगस्वरूप हैं। वे बद्ध जीवन के कारण मन समेत छहों इन्द्रियों से संघर्ष करती रहती हैं।”

प्रकृति पर अधिकार करने की चेष्टा में जीवात्मा अपने अस्तित्व के लिए कठिन संघर्ष करता है। दरअसल सुखोपभोग के लिए वह इतना कठिन श्रम करता है कि भौतिक साधनों का ठीक से उपभोग भी नहीं कर पाता। अत: वह कभी-कभी जीव या प्रकृति कहलाता है, क्योंकि वह तटस्था शक्ति में स्थित होता है। जब जीवात्मा प्रकृति के तीनों गुणों से आच्छादित होता है, तो जीव-संज्ञिता कहलाती है। जीवात्माएँ दो प्रकार की होती हैं—क्षर तथा अक्षर। क्षर वे हैं, जो च्युत होकर बद्ध हो गई हैं और अक्षर वे हैं, जो बद्ध नहीं हैं। अधिकांश जीवात्माएँ आध्यत्मिक जगत में रहती हैं और अक्षर कहलाती हैं। वे ब्रह्म पद पर होती हैं। वे तीनों गुणों से बद्ध जीवात्माओं से भिन्न होती हैं।

क्षर तथा अक्षर इन दोनों से ऊपर होने के कारण भगवान् श्रीकृष्ण अथवा वासुदेव को भगवद्गीता (१५.१८) में पुरुषोत्तम कहा गया है। निर्विशेषवादी वासुदेव को निर्गुण ब्रह्म बताते हैं, किन्तु वास्तव में निर्गुण ब्रह्म कृष्ण के अधीन होता है, जिसकी पुष्टि भी भगवद्गीता (१४.२७) में हुई है—ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्। ब्रह्म-संहिता (५.४०) में भी पुष्टि हुई है कि श्रीकृष्ण ही निर्गुण ब्रह्म के स्रोत हैं—यस्य प्रभा प्रभावतो जगदण्डकोटि। निर्गुण ब्रह्म श्रीकृष्ण के शारीरिक तेज के अतिरिक्त और कुछ नहीं है और इस तेज की किरणों में असंख्य ब्रह्माण्ड तैर रहे हैं। इस तरह सभी प्रकार से वासुदेव कृष्ण परमेश्वर हैं और शिवजी भगवान् के शरणागतों पर परम प्रसन्न रहते हैं। श्रीकृष्ण यही चाहते हैं कि समर्पण पूर्णत: हो जैसाकि भगवद्गीता के अन्तिम अध्याय (१८.६६) में उन्होंने इंगित किया है— सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।

साक्षात् शब्द भी महत्त्वपूर्ण है। तथाकथित भक्त तो अनेक हैं, किन्तु वास्तव में वे केवल कर्मी तथा ज्ञानी होते हैं, क्योंकि वे प्रत्यक्ष रूप से भगवान् श्रीकृष्ण के भक्त नहीं होते। कभी-कभी कर्मी अपने कर्म का कर्मफल वासुदेव को अर्पित कर देते हैं, जो कर्मार्पणम् कहलाता है। ये सकाम कर्म माने जाते हैं, क्योंकि कर्मीजन भगवान् विष्णु को भी शिव तथा ब्रह्मा जैसा देवता मानते हैं। चूँकि वे विष्णु को देवताओं के समान पद पर मानते हैं, अत: उनके अनुसार देवताओं के प्रति समर्पण वासुदेव के प्रति समर्पण जैसा है। किन्तु यहाँ पर इस मत का तिरस्कार हुआ हैं, क्योंकि यदि यह सत्य होता तो शिवजी कहते कि मुझमें, वासुदेव, विष्णु या ब्रह्मा में समर्पण एक ही है। किन्तु शिवजी ऐसा नहीं कहते, क्योंकि वे स्वयं वासुदेव की शरण में जाते हैं और जो कोई भी वासुदेव की शरण में जाता है, वह उन्हें परम प्रिय है। यहाँ पर इसका स्पष्ट वर्णन हुआ है। निष्कर्ष यह है कि शिव का भक्त शिव को प्रिय नहीं है, किन्तु भगवान् कृष्ण का भक्त शिव को अत्यन्त प्रिय है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥