श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 29

 
श्लोक
स्वधर्मनिष्ठ: शतजन्मभि: पुमान्
विरिञ्चतामेति तत: परं हि माम् ।
अव्याकृतं भागवतोऽथ वैष्णवं
पदं यथाहं विबुधा: कलात्यये ॥ २९ ॥
 
शब्दार्थ
स्व-धर्म-निष्ठ:—जो अपने धर्म या वृत्ति पर स्थित रहता है; शत-जन्मभि:—एक सौ जन्मों तक; पुमान्—जीवात्मा; विरिञ्चताम्—ब्रह्मा का पद; एति—प्राप्त करता है; तत:—पश्चात्; परम्—ऊपर; हि—निश्चय ही; माम्—मुझको प्राप्त करता है; अव्याकृतम्—बिना विचलित हुए; भागवत:—भगवान् को; अथ—अत:; वैष्णवम्—भगवान् का शुद्ध भक्त; पदम्—पद; यथा—जिस तरह; अहम्—मैं; विबुधा:—देवतागण; कला-अत्यये—संसार के संहार के बाद ।.
 
अनुवाद
 
 जो व्यक्ति अपने वर्णाश्रम धर्म को समुचित रीति से एक सौ जन्मों तक निबाहता है, वह ब्रह्मा के पद को प्राप्त करने के योग्य हो जाता है और इससे अधिक योग्य होने पर वह शिवजी के पास पहुँच सकता है। किन्तु जो व्यक्ति अनन्य भक्तिवश सीधे भगवान् कृष्ण या विष्णु की शरण में जाता है, वह तुरन्त वैकुण्ठलोक में पहुँच जाता है। शिवजी तथा अन्य देवता इस संसार के संहार के बाद ही इन लोक को प्राप्त कर पाते हैं।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में विकास-प्रक्रम की चरम परिणति सम्बन्धी विचार प्रस्तुत हुआ है। जैसाकि वैष्णव कवि जयदेव गोस्वामी ने कहा है—प्रलय पयोधि जले धृतवान् असि वेदम्। आइये, हम विकास-प्रक्रम की खोज को प्रलय से प्रारम्भ करें। जिस समय सारा ब्रह्माण्ड जल से पूरित था।
उस समय अनेक मछलियाँ तथा अन्य जलचर थे, इनसे ही लताओं तथा वृक्षों का विकास हुआ। फिर इनसे कीड़े-मकोड़े तथा सरीसृपों का विकास हुआ, जिनसे पक्षी, पशु तथा मनुष्य और अन्त में सभ्य मानव का विकास हुआ। अब सभ्य मानव ऐसे चौराहे पर है जहाँ से वह आध्यात्मिक जीवन में आगे विकास कर सकता है। यहाँ यह कहा गया है कि जब जीव को जीवन का सभ्य रूप प्राप्त होता है, तो स्वधर्म, अर्थात् अपने कर्म तथा गुणों के अनुसार उसमें सामाजिक श्रेणियाँ होनी चाहिए (स्वधर्मनिष्ठ: )। भगवद्गीता (४.१३) में इसका संकेत है—

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश: “प्रकृति के तीनों गुणों तथा उनके कार्यों के अनुसार मैंने मानव-समाज के चारों वर्णों की सृष्टि की।”

सभ्य मानव-समाज में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र—ये चार वर्ण होने चाहिए और प्रत्येक व्यक्ति को अपने-अपने वर्ण के अनुसार कर्म करना चाहिए। यहाँ यह कहा गया है (स्वधर्मनिष्ठ: ) कि ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य या शूद्र होने से कोई अन्तर नहीं पड़ता। यदि कोई अपने पद पर अटल रहे और अपने विशिष्ट कार्य को करे तो वह सभ्य मनुष्य समझा जाता है। अन्यथा वह पशु तुल्य है। यहाँ यह भी कहा गया है कि जो भी स्वधर्म को एक सौ जन्मों तक सम्पन्न करता है (उदाहरणार्थ, ब्राह्मण एक ब्राह्मण की तरह कर्म करता रहता है) वह ब्रह्मलोक में जाने का अधिकारी बन जाता है। इसी तरह शिवलोक या सदाशिवलोक भी है, जो आध्यात्मिक तथा भौतिक (मर्त्य) जगत की सीमा पर स्थित है। यदि ब्रह्मलोक में स्थित रहने के बाद कोई अधिक योग्य बन जाता है, तो वह सदाशिवलोक को भेज दिया जाता है। इसी प्रकार यदि कोई और भी योग्य हो जाता है, तो वह वैकुण्ठलोक जा सकता है। प्रत्येक व्यक्ति का, यहाँ तक कि देवताओं का भी, लक्ष्य वैकुण्ठलोक प्राप्त करना रहता है और एक निष्काम भक्त यदि भौतिक लाभ की इच्छा न रखता हो, तो इसे पा लेता है। जैसाकि भगवद्गीता (८.१६) में संकेत है, कोई भले ही ब्रह्मलोक को क्यों न प्राप्त कर ले, किन्तु भौतिक कष्टों से उसे छुटकारा नहीं मिल पाता (आब्रह्मभुवनाल्लोका: पुनरावर्तिनोऽर्जुन )। इसी प्रकार शिवलोक तक पहुँच कर भी मनुष्य सुरक्षित नहीं रहता, क्योंकि शिवलोक तटस्थ है। किन्तु यदि कोई वैकुण्ठलोक को प्राप्त कर लेता है, तो उसे जीवन की परम सिद्धि प्राप्त हो जाती है और उसका विकास-प्रक्रम समाप्त हो जाता है (मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते )। दूसरे शब्दों में, यहाँ इसकी पुष्टि की गई है कि मानव-समाज में जिस व्यक्ति ने चेतना विकसित कर ली है उसे कृष्ण-भक्ति करनी चाहिए जिससे वह इस शरीर को त्यागने के बाद तुरन्त वैकुण्ठलोक या कृष्णलोक को जा सके। त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन (भगवद्गीता ४.९)। जो भक्त कृष्णभक्ति करता है और जो ब्रह्मलोक या शिवलोक जैसे किसी भी लोक से आकृष्ट नहीं होता वह कृष्णलोक को भेज दिया जाता है (मामेति ) यही जीवन की तथा विकास-प्रक्रम की चरम परिणति है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥