श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 3

 
श्लोक
अन्तर्धानगतिं शक्राल्लब्ध्वान्तर्धानसंज्ञित: ।
अपत्यत्रयमाधत्त शिखण्डिन्यां सुसम्मतम् ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
अन्तर्धान—विलुप्त होने की; गतिम्—शक्ति; शक्रात्—इन्द्र से; लब्ध्वा—पाकर; अन्तर्धान—अन्तर्धान; संज्ञित:—नाम पड़ा; अपत्य—संतानें; त्रयम्—तीन; आधत्त—उत्पन्न कीं; शिखण्डिन्याम्—अपनी पत्नी शिखण्डिनी से; सु-सम्मतम्—सबों द्वारा अनुमत ।.
 
अनुवाद
 
 पूर्वकाल में महाराज विजिताश्व ने स्वर्ग के राजा इन्द्र को प्रसन्न करके उनसे अन्तर्धान की पदवी प्राप्त की थी। उनकी पत्नी का नाम शिखण्डिनी था जिससे उन्हें तीन उत्तम पुत्र हुए।
 
तात्पर्य
 महाराज विजिताश्व अन्तर्धान नाम से विख्यात थे, जिसका अर्थ होता है “विलुप्त होना।” यह पदवी उन्हें इन्द्र से प्राप्त हुई थी। यह उस समय की बात है जब इन्द्र ने महाराज पृथु के घोड़े को यज्ञस्थल से चुरा लिया था। जब वह घोड़ा चुरा रहा था, तो औरों के लिए तो वह अदृश्य था, किन्तु महाराज पृथु के पुत्र विजिताश्व ने उसे देख लिया था। यह जानते हुए कि इन्द्र उसके पिता का घोड़ा चुराये ले जा रहा है विजिताश्व ने उस पर आक्रमण नहीं किया। इससे पता चलता है कि महाराज विजिताश्व सही व्यक्तियों का सम्मान करते थे। यद्यपि
इन्द्र उसके पिता का घोड़ा चुराये ले जा रहा था, किन्तु विजिताश्व को ज्ञात था कि इन्द्र कोई सामान्य चोर नहीं है। चूँकि इन्द्र एक महान् शक्तिशाली देवता था और भगवान् का सेवक था, अत: विजिताश्व ने जानबूझ कर उसे क्षमा कर दिया था यद्यपि इन्द्र गलत कार्य कर रहा था। इससे इन्द्र विजिताश्व पर परम प्रसन्न हुआ। देवताओं में इच्छानुसार प्रकट होने तथा छिपने की योगशक्ति पाई जाती है और चूँकि इन्द्र विजिताश्व पर परम प्रसन्न था, अत: उसने उसे यह योगशक्ति प्रदान की। इस प्रकार विजिताश्व अन्तर्धान कहलाया।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥