श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 30

 
श्लोक
अथ भागवता यूयं प्रिया: स्थ भगवान् यथा ।
न मद्भागवतानां च प्रेयानन्योऽस्ति कर्हिचित् ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
अथ—अत:; भागवता:—भक्त; यूयम्—तुम सब; प्रिया:—प्रिय; स्थ—तुम हो; भगवान्—भगवान्; यथा—जिस तरह; न—न तो; मत्—मेरी अपेक्षा; भागवतानाम्—भक्तों का; च—भी; प्रेयान्—अत्यन्त प्रिय; अन्य:—दूसरा; अस्ति—है; कर्हिचित्— किसी समय, कभी ।.
 
अनुवाद
 
 तुम सभी भगवान् के भक्त हो, अत: तुम मेरे लिए भगवान् के समान पूज्य हो। इस प्रकार से मैं यह जानता हूँ कि भक्त भी मेरा आदर करते हैं और मैं उन्हें प्यारा हूँ। इस प्रकार भक्तों को मेरे समान अन्य कोई प्रिय नहीं हो सकता है।
 
तात्पर्य
 कहा जाता है कि वैष्णवानां यथा शम्भु:—शिवजी समस्त भक्तों में श्रेष्ठ हैं। अत: भगवान् श्रीकृष्ण के सारे भक्त शिवजी के भी भक्त हैं। वृन्दावन में शिवजी का एक मन्दिर है, जिसे गोपीश्वर कहते हैं। गोपियाँ न केवल शिव की उपासना करती थीं, अपितु कात्यायनी या दुर्गा की भी। किन्तु उनका एकमात्र लक्ष्य कृष्ण की कृपापात्र बनना था। भगवान् कृष्ण का भक्त शिव का कभी भी अनादर नहीं करता, प्रत्युत कृष्ण के परम भक्त के रूप में उनकी पूजा करता है। अत: जब भी कोई भक्त शिव की आराधना करता है, तो वह उनसे उसे कृष्ण का कृपाभाजन बनाने की प्रार्थना करता है, वह उनसे भौतिक लाभ नहीं माँगता। भगवद्गीता (७.२०) में कहा गया है कि सामान्यत: लोग देवताओं की पूजा भौतिक लाभ के लिए करते हैं। कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञाना:। काम के वशीभूत होकर वे देवताओं की पूजा करते हैं, किन्तु भक्त ऐसा नहीं करता, क्योंकि वह कामाभिभूत कभी नहीं होता। शिवजी के लिए किसी भक्त के और असुर के आदर में यही अन्तर होता है। असुर शिव की पूजा करता है, वह कोई न-कोई वर प्राप्त करता है, उसका दुरुपयोग करता है और अन्त में भगवान् के हाथों मारा जाता है।
भगवान् ही उसे मुक्ति प्रदान करते हैं।

चूँकि शिवजी भगवान् के महान् भक्त हैं, इसीलिए वे भगवान् के सभी भक्तों को प्यार करते हैं। शिवजी ने प्रचेताओं को बताया कि भगवान् के भक्त होने के कारण वे उन्हें प्रिय हैं। शिवजी केवल प्रचेताओं पर ही दयालु नहीं थे, उन्हें तो भगवान् का कोई भी भक्त प्रिय है। भक्तगण शिव को प्रिय ही नहीं हैं, अपितु वे उनके द्वारा भगवान् के समान ही आदरित होते हैं। इसी प्रकार भगवान् के भक्त भी शिव की पूजा भगवान् कृष्ण के परम प्रिय भक्त के रूप में करते हैं। वे उन्हें पृथक् से भगवान् के रूप में नहीं पूजते। नाम-अपराधों की सूची में यह उल्लेख है कि हर अर्थात् शिव के नाम जप को हरि के समान मानना अपराध है। भक्तों को जानना चाहिए कि विष्णु ही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं और शिवजी उनके भक्त हैं। भक्त का आदर भगवान् के ही समान किया जाना चाहिए और कभी-कभी तो उनसे भी बढक़र। दरअसल, स्वयं भगवान् राम ने कभी शिव की पूजा की थी। यदि भगवान् भक्त की पूजा करते हैं, तो फिर एक भक्त दूसरे भक्त की भगवान् के समान पूजा क्यों नहीं कर सकता? यही निष्कर्ष है। इस श्लोक से प्रतीत होता है कि शिवजी असुरों को औपचारिकता वश आशीर्वाद देते हैं। वास्तव में उन्हें भगवान् का ही भक्त प्यारा है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥