श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 31

 
श्लोक
इदं विविक्तं जप्तव्यं पवित्रं मङ्गलं परम् ।
नि:श्रेयसकरं चापि श्रूयतां तद्वदामि व: ॥ ३१ ॥
 
शब्दार्थ
इदम्—यह; विविक्तम्—विशेष; जप्तव्यम्—सदैव जप करने के लिए; पवित्रम्—अत्यन्त शुद्ध; मङ्गलम्—कल्याणकर; परम्—दिव्य; नि:श्रेयस-करम्—अत्यन्त उपयोगी; च—भी; अपि—निश्चय ही; श्रूयताम्—कृपा करके सुनें; तत्—वह; वदामि—मैं कह रहा हूँ; व:—तुमसे ।.
 
अनुवाद
 
 अब मैं एक मंत्र का उच्चारण करूँगा जो न केवल दिव्य, पवित्र तथा शुभ है वरन् जीवन- उद्देश्य को प्राप्त करने के इच्छुक हर एक के लिए यही श्रेष्ठ स्तुति भी है। जब मैं इस मंत्र का उच्चारण करूँ तो तुम सब सावधानी से ध्यानपूर्वक सुनना।
 
तात्पर्य
 विविक्तम् शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। शिव द्वारा सुनायी गई इस स्तुति को सम्प्रदायपरक नहीं समझना चाहिए, अपितु इसे अत्यन्त रहस्यात्मक मानकर समृद्धि प्राप्त
करने या शुभ जीवन-लक्ष्य के लिए शिव के आदेशों का पालन करना चाहिए और भगवान् की स्तुति तथा महिमा का गान उसी तरह करना चाहिए जैसाकि स्वयं शिवजी ने किया।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥