श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 33

 
श्लोक
श्रीरुद्र उवाच
जितं त आत्मविद्वर्यस्वस्तये स्वस्तिरस्तु मे ।
भवताराधसा राद्धं सर्वस्मा आत्मने नम: ॥ ३३ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-रुद्र: उवाच—शिवजी ने कहा; जितम्—समस्त महिमाएँ, उत्कर्ष; ते—तुम्हारे; आत्म-वित्—स्वरूपसिद्ध; वर्य—श्रेष्ठ; स्वस्तये—कल्याण के लिए; स्वस्ति:—कल्याण; अस्तु—हो; मे—मेरा; भवता—आपसे; आराधसा—सब विधि से पूर्ण (सर्वात्मक) द्वारा; राद्धम्—पूज्य; सर्वस्मै—परमात्मा; आत्मने—परमात्मा को; नम:—नमस्कार है ।.
 
अनुवाद
 
 शिवजी ने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की इस प्रकार स्तुति की: हे भगवान्, आप धन्य हैं। आप सभी स्वरूपसिद्धों में महान् हैं चूंकि आप उनका सदैव कल्याण करने वाले हैं, अत: आप मेरा भी कल्याण करें। आप अपने सर्वात्मक उपदेशों के कारण पूज्य हैं। आप परमात्मा हैं, अत: पुरुषोत्तम स्वरूप आपको मैं नमस्कार करता हूँ।
 
तात्पर्य
 ज्योंही भक्त भगवान् की स्तुति के लिए प्रोत्साहित होता है त्योंहीं वह प्रारम्भ में इस प्रकार बोलते हुए स्तुति करने लगता है—“हे भगवान् आप धन्य हैं।” भगवान् की महिमा का गान इसलिए किया जाता है, क्योंकि वे स्वरूपसिद्ध पुरुषों में प्रधान माने जाते हैं। जैसाकि वेदों में (कठोपनिषद् २.२.१३) में कहा गया है—नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्—परम पुरुषोत्तम भगवान् ही समस्त जीवों में प्रधान पुरुष हैं। जीव कई प्रकार के होते हैं—कुछ तो इस भौतिक जगत में रहते हैं और कुछ वैकुण्ठलोक में। जो वैकुण्ठलोक में रहते हैं, वे पूर्णरूपेण स्वरूपसिद्ध होते हैं, क्योंकि आध्यात्मिक स्तर पर जीव भगवान् की सेवा करना नहीं भूलता। अत: वैकुण्ठलोक में भगवान् की भक्ति करने वाले सारे लोग शाश्वत स्थिर रहते हैं, क्योंकि वे परमेश्वर की स्थिति के साथ-साथ अपनी स्वाभाविक स्थिति से भी परिचित होते हैं। इस प्रकार स्वरूपसिद्ध जीवों में भगवान् परम स्वरूपसिद्ध पुरुष कहलाते हैं। नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्। जब जीव भगवान् को परम पुरुष समझने में स्थिर हो जाता है, तो वास्तव में वह सर्वकल्याणमय स्थिति पर स्थिर हो जाता है। यहाँ पर शिवजी प्रार्थना करते हैं कि भगवान् की कृपा से उनका शुभ स्थान सदैव बना रहे।
परमेश्वर सभी प्रकार से पूर्ण हैं और उनका यही उपदेश है कि जो उन्हें पूजता है, वह भी पूर्ण हो जाता है। जैसाकि भगवद्गीता (१५.१५) में कहा गया है—मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च। भगवान् सबों के हृदय में परमात्मा रूप में स्थित हैं, किन्तु वे अपने भक्तों पर इतने दयालु रहते हैं कि उनकी सतत उन्नति के लिए उन्हें उपदेश देते रहते हैं। जब वे सर्व-परिपूर्ण से उपदेश ग्रहण करते हैं, उनके भ्रमित होने की कोई सम्भावना नहीं रहती। इसकी पुष्टि भगवद्गीता (१०.१०) में इस प्रकार हुई है—ददामि बुद्धि-योगं तं येन मामुपयान्ति ते। भगवान् शुद्ध भक्त को उपदेश देने के लिए सतत उद्यत रहते हैं जिससे वह भक्ति में उन्नति करता चले। चूँकि भगवान् सर्वात्मा के रूप में उपदेश देते हैं, अत: शिवजी उन्हें सर्वात्मा आत्मने नम: करके सम्मान अपर्ण करते हैं। व्यष्टि जीव आत्मा कहलात है और भगवान् आत्मा तथा परमात्मा दोनों हैं। प्रत्येक हृदय में स्थित होने के कारण भगवान् परम-आत्मा कहलाते हैं। अत: उन्हें सभी नमस्कार करते हैं। इस प्रसंग में श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कंध (१.८.२०) में कुन्ती की स्तुति का उल्लेख किया जा सकता है—

तथा परमहंसानां मुनीनाममलात्मनाम्।

भक्तियोगविधानार्थं कथं पश्येम हि स्त्रिय: ॥

परमहंसों को उपदेश देने के लिए भगवान् सदैव उद्यत रहते हैं, क्योंकि वे संसार के कल्मषों से पूर्ण रूप से मुक्त होते हैं। भगवान् ऐसे भक्तों को यह बतलाने के लिए कि भक्ति में कैसे स्थिर रहा जाये उपदेश देते हैं। इसी प्रकार भागवत (१.७.१०) में आत्माराम श्लोक में कहा गया है— आत्मारामश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे।

कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरि: ॥

आत्माराम शब्द भौतिक जगत से विरक्त होकर आत्म-साक्षात्कार में लगे रहने वालों के लिए आया है। ऐसे स्वरूपसिद्ध पुरुष सामान्यत: दो प्रकार के होते हैं—सगुण तथा निर्गुण। किन्तु निर्विशेषवादी भी भगवान् के वैयक्तिक दिव्य गुणों के प्रति आकृष्ट होने पर भक्त बन जाते हैं। निष्कर्षत: शिवजी भगवान् वासुदेव के स्थिर भक्त बने रहना चाहते थे। जैसाकि अगले श्लोकों में बताया गया है शिवजी कभी-भी निर्विशेषवादियों की तरह परमेश्वर से तादात्म्य नहीं चाहते, अपितु वे इसे अपना सौभाग्य मानते हैं कि वे परम पुरुष रूपी भगवान् की भक्ति में स्थिर बने रहें। इसी ज्ञान से मनुष्य यह समझ पाता है कि सभी जीवात्माएँ, जिनमें ब्रह्मा, शिव तथा अन्य देवता सम्मिलित हैं, परमेश्वर के दास हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥