श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 34

 
श्लोक
नम: पङ्कजनाभाय भूतसूक्ष्मेन्द्रियात्मने ।
वासुदेवाय शान्ताय कूटस्थाय स्वरोचिषे ॥ ३४ ॥
 
शब्दार्थ
नम:—नमस्कार है; पङ्कज-नाभाय—उन भगवान् को जिनकी नाभि से कमल प्रकट होता है; भूत-सूक्ष्म—इन्द्रिय वस्तुएँ (तन्मात्रा); इन्द्रिय—इन्द्रियाँ; आत्मने—उत्पत्ति; वासुदेवाय—भगवान् वासुदेव को; शान्ताय—सदैव शान्त रहने वाले को; कूट-स्थाय—अपरिवर्तित रहने वाले को; स्व-रोचिषे—स्वयं प्रकाश को ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवान्, आपकी नाभि से कमल पुष्प निकलता है, इस प्रकार से आप सृष्टि के उद्गम हैं। आप इन्द्रियों तथा तन्मात्राओं के नियामक हैं। आप सर्वव्यापी वासुदेव भी हैं। आप परम शान्त हैं और स्वयंप्रकाशित होने के कारण आप छह प्रकार के विकारों से विचलित नहीं होते।
 
तात्पर्य
 इस ब्रह्माण्ड में गर्भोदकशायी विष्णु गर्भोदक में शयन करते हैं और उनकी नाभि से कमल का फूल निकलता है। इस फूल से ब्रह्मा उत्पन्न होते हैं और ब्रह्मा इस संसार की सृष्टि आरम्भ करते हैं। इस प्रकार गर्भोदकशायी विष्णु भौतिक इन्द्रियों तथा तन्मात्राओं के उद्गम हैं। चूँकि शिवजी अपने आपको इस संसार के पदार्थों में से एक मानते हैं, अत: उनकी इन्द्रियाँ परम स्रष्टा के अधीन हैं। परमेश्वर को हृषीकेश अर्थात् इन्द्रियों का स्वामी भी कहा जाता है, जिससे सूचित होता है कि हमारी इन्द्रियाँ तथा तन्मात्राएँ परमेश्वर द्वारा निर्मित हैं। अत: वे हमारी इन्द्रियों को वश में रख सकते हैं और अपने अनुग्रहवश अपनी सेवा में प्रवृत्त करते हैं। बद्ध अवस्था में, जीवात्मा इस संसार में संघर्ष करता है और भौतिक तुष्टि में इन्द्रियों को लगाता है। यदि परमात्मा की अनुकम्पा हो गई तो वह इन्हीं इन्द्रियों को भगवद्भक्ति में लगा सकता है। शिवजी भौतिक इन्द्रियों द्वारा पथभ्रष्ट न होकर भौतिक कल्मष से दूर रहते हुए उन्हें भगवान् की सेवा में लगाना चाहते हैं। भगवान् वासुदेव की कृपा होने पर जो सर्वव्यापक हैं, मनुष्य अपनी इन्द्रियों को बिना विचलन के भक्ति में लगा सकता है जैसे भगवान् विचलित हुए बिना कार्य करते हैं।
इस श्लोक का शान्ताय कूटस्थाय स्वरोचिषे अंश अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इस संसार में विद्यमान रहकर भी भगवान् भवसागर की लहरों से विचलित नहीं होते हैं। किन्तु बद्धजीव छह प्रकार के विकारों से विचलित होते हैं। ये हैं—भूख, प्यास, शोक, मोह, जरा तथा मृत्यु। यद्यपि बद्धजीव इन सबसे बहुत जल्दी प्रभावित होता है, किन्तु परमात्मास्वरूप भगवान् वासुदेव इनसे कभी विचलित नहीं होते। इसीलिए यहाँ यह कहा गया है कि वे सदैव शान्त (कूटस्थाय ) तथा अपने कौशल्य के कारण अविचल रहते हैं, जिसे यहाँ स्वरोचिषे कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वे अपनी दिव्य स्थिति के कारण स्वयंप्रकाशित होते हैं। दूसरे शब्दों में, जीव यद्यपि वह परमेश्वर के प्रकाश में होता है, कभी- कभी परमेश्वर के प्रकाश से अपनी क्षुद्र स्थिति के कारण नीचे गिरकर भौतिक बद्ध जीवन में प्रवेश करता है। किन्तु भगवान् इस प्रकार बद्ध नहीं होते, इसीलिए उन्हें स्वयंप्रकाशित कहा गया है। फलत: वासुदेव की शरण में रहकर या भक्ति में प्रवृत्त होकर इस संसार में कोई भी बद्धजीव पूर्ण रह सकता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥